महाप्रस्थान के पथ पर | Mahaprasthan Ke Path Par
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
162
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)महाप्रस्गन के पथ् प्र ५ & षं £
चेहरा होता है. पद्मासन यो तरह उस पर चेठा जाता हैं. इससे मार्ग का
परिभम ते चच जाता है. सन्तु 'पाराम नहीं मिचता। पदले-पढले तो
याश्नियो के इत्य में उत्साह होता हूं, पर चार-छ' दइन बार उनकी चान
মল द्दो जाती 1 कमर् लेगा कर चलने लयत्ता ह् कोई ঘা रह् जाता
है कोई बीमार हो जाता है, कसी को चलने से घृणा हो जाती हैं, 'पोर
कोई दापस चला जाना षह) निस पदले स्वस्थ, सचल, पसनन्नचित्त
स्मर सिट्सारी देखा धा-चक्षई दिनो के दाद उसके शरीर को दुचला-
पतला, धूल आर धूप से सन्तिन देखा, करुण-क्ञातर दृए हूं। शायद
चलने से उनके पाँदो मे दद रहता है, मुझ ओर आंखों पर पप्रराभाविक
विरष्णा है जोर त्यन्त चिड्चिडा स्वभाव हो गया हे 1 पास खड़ देने
स उर लगता है। यात्रियो की यह अवस्था कनी समस्ते हे रसलिए जो
देष्र कुली होने र. उनकी पीठ पर खाली क्ार्डी रूलती रहती है,
कई दिनो तक धैेयपू्रेक दे यात्रियों के ऋूण्डो के पीछे-पीछे चलन है।
फिर देखा जाता है धीरेपीरे एक-एक करके उनके खरीदार मिल ग
है. तच या्नियो चष गरल ससभ्तकर इरी चहुत किराया मौरते हे, खोर
खिर लाचार चेक्र याधरियो क्यो उेना ही पड़ता है। गज घुरी बला
है -खमाज व्ी तरह चोरी-डकेतो आदि छुद्द नहीं
तरप याच निरय होता हे। छुल्ली दिश्दासी
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