कुमारपाल चरितम् | Kumarpal Charitam

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Kumarpal Charitam by रूपेन्द्रकुमार पगारिया - Rupendrakumar Pagariya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १४५) गुजरात में ऐसे कई प्रभावक व्यक्ति हुए हैं। सिद्धराज जयतिह, परमाहंत कुसारपाल, महामात्म वस्तुपाल, जगड़शाह और पेथडशाह आदि इसी प्रकार के उदारमना, धर्मपरायण एवं साहित्यप्रेमी व्यक्ति थे, जिनफ़े जीवन से प्रभावित होकर जैन कवियों ते उन्हें काव्य का नायक बनाया है। हेमचन्द्र कृत “दुयाश्रयकाव्य', बालचन्द्रसूरि कृत “वसन्तविलास' एवं उदयप्रभसूरि कृत “धर्माध्युदय'” इसो प्रकार को ऐतिद्ासिक रचनाएँ हैं । ये रचनाएँ काव्य एवं इतिहास दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं ।! गुजरात के इतिहास के लिए कई जैन काव्य महत्वपूर्ण सामभ्री प्रस्तुत करते हैं। ठाकुर अरिसिहकृत “सुकृतसंकीतंग'” नामक काव्य मे महामात्य वस्तुपाल के जीवन एवं उनके लोकप्रिय कायो का वर्णन है! यह पहला ऐतिहासिक काव्य है, जिसमें चावड़ाबंश का वर्णन है। बालचम्द्रसूरि कृत '“वसनन्‍्तविलास” नामक काव्य वस्तुपाल के जीवनचरित पर बिस्तार से प्रकाश डालता है। इस ग्रन्थ मे जयसिंह, कुमारपाल एवं भीम द्वितीय का भौ वर्जन किया गमा है। जयभिहुमूरिकृत “कुंमारपाल भूपालचरित” एक घटना-प्रधात काव्य है। इस ग्रन्थ में कुमारपाल सम्बन्धी कई अलौकिक घटनाओं का वर्णन है। सोमप्रभकृत “कुमारपाल प्रतिबोध एक कथाकोश है। इसमें कुमारपाल के जीवन के सम्बन्ध में कुछ तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। मुनि जिनविजय जी ने ““कुमारपाल घरिश्र संग्रह” नामक प्रस्थ में कुमार- पाल के जीवन से सम्बन्धित कुछ प्राचीन काव्य ग्रस्थों का परिचय दिया है। इस सब रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि कुमारपाल के जौवन-चरितने कई जैन कवियों को काव्य सूजन के लिए प्रेरित किया था। उन सब का आदर्श आचार्य हेमचन्द्रकृत “द्वयाक्रयकाज्य” रहू है आचार्य हेमचन्द्र द्वारा रचित द्याश्रयकाव्य के दो भाग हैं। प्रथम भाग में २० सर्ग हैं एवं ट्वितीय भाग में ८ सगं है इस तरह यह कुल २८ सर्गो का महा- काव्य है । आचार्य हेमचन्द्र ने भपने इस ग्रन्थ का यह्‌ विभाजन स्वरचित हिमशब्दा- नुशासन' व्याकरण ग्रन्थ को ध्यान में रखकर किया है । उनके इस व्याकरण ग्रन्थ में प्रथम सात अध्यायो में संस्कृत व्याकरण के सूत्र हैं एवं अन्तिम आठवें अध्याय में प्राकृत व्याकरण के नियम वर्णित हैं । संस्कृत एवं प्राकृत व्याकरण के इन नियमों के अनुसार शब्दो के उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए आचार्यं हेमचन्द्र ने दुयाश्रयकाव्यः लिखा । इसके द्वारा उन्होंने दोहरे उद्देश्य की पूति की है। एक ओर चौलुक्यवंशी राजाओं के जीवन-चरित का वर्णन हो जाता है एवं दूसरी ओर संस्क्ृत-प्राकृत के ২. द्रष्टव्य--चौधरी, गुलाबचन्द : जैन साहित्य का बृहत्‌ इतिहास, भाग ६, पृष्ठ ३६२-४७४.




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