ऋषभायण | Rishbhayan

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Rishbhayan by आचार्य महाप्रज्ञ - Acharya Mahapragya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जलद जैसे धो गया ज्ञान से अज्ञान का आवरण जैसे हट गया आज घरती-पुत्र का मुल दीप्त, वधन कट गया । तपस्या की आच में साधना का सोना कुद | निर रहय था । एक दिन वह अपूर्व सिद्धि की आभा से दमक ভতা। अयोध्या महानयर की उपरनगर पुरिमताल ! शकटमुष नाम का रमणीय उद्यान । चैत्यवृक्ष की छाया मे ध्यान सीन कषम ! वृक्ष आर मनुप्य मे एक अनवोला सा रिश्ता हे । मनुष्य वृक्ष स प्यार करता है। वृक्ष उसके जीवन का एक आधार जैसा बना हुआ है। इतना ही नहीं, बोधि के उदय मे श्रेष्ठ वृक्ष निमित्त वनते है। भगवान्‌ बुद्ध, भगवान महावीर आदि अनेक महापुरुषा को वृक्ष के परिपश्य मे विशिष्ट बोधि की उपलब्धि हुई है। पर्यावरण की गहराती समस्या ने आज वृक्षो की उपयोगिता की ओर सवका ध्यान अक्रुष्ट किया है किन्तु अथ्मात्म-चेतना के जागरण मेँ भी वे सहायफ बनते है, यह तथ्य प्राचीन कालसे ही विज्ञाते रहयटै- ¦ | मानव तरु म रहा अभेद 1 जुडा परस्पर अति सवेद ^ |, अ, मानव तुके साय! तरू ने भरी फैलाया हाथ । 1 मानय करता तह से प्यार ¦, 5 तरु उसका जीवन आधार 7. 15 १ * बोधि उदय में सुतरु निमित्त রি




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