गाँधीजी को केंद्र में रखकर हिंदी काव्य का अध्ययन और मूल्यांकन | Gandhi Ji Ko Kendra Mein Rakh Kar Hindi Kavya Ka Adyayan Aur Mulyankan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रतीक 'तिरंगा झण्डा' लहराया गया गांधीजी ने साम्प्रदायिक एकता के लिए नोआखली की पेदल-यात्रा की, शान्ति एवं सौहा्द्र-भाव बनाये रखने के लिए 72 घण्टे का सफल अनशन किया। 8 सितम्बर 1947 में साम्प्रदायिक ज्वाला भड़कने पर दिल्‍ली का दौरा किया। 18 जनवरी 1948 ई0 में शीर्षस्थ नेताओं के आश्वासन पर 421 घण्टें का उपवास समाप्त किया। मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म एक धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। इनकी माता पुतलीबाई चन्द्रायण-व्रत रखती थी। धर्म-अध्यात्म में संस्कारित होने के कारण उपवास, व्रत उनके जीवन का हिस्सा बन चुका था। चन्द्रायण-व्रत में जब तक चन्द्रमा के दर्शन न हो जाये, तब तक भोजन नहीं किया जाता है। जब चन्द्रमा वर्षा-ऋतु मेँ देर से निकलता था तो माँ के लिए मोहन उसका इन्तजार करते रहते थे, ज्योंकि ही चन्द्रमा निकलता मोहन तुरन्त माँ को बताते थे। बालक मोहनदास पर माँ की धर्मपरायणता ओर उनके व्रत-उपवास का विशेष प्रभाव पड़ा। घर की नौकरानी रम्भा-वाई थी जो शैशव अवस्था से ही उनकी देख-रेख मेँ रहती थी । बाल्यावस्था में ही रम्भाबाई ने उन्हें 'राम-नाम' का मन्त्र दिया, तभी से मोहन के हृदय पर राम के प्रति अगाध श्रद्धा पैदा हो गई! इस प्रकार उनमें धर्म, व्रत एवं उपवासों के प्रति निष्ठाभाव, राम नाम के प्रति श्रद्धा-भाव का बीजारोपण हुआ। गांधीजी के प्रपितामह, पितामह और पिता तीनों ही कर्मठ, ईमानदार, दृढ़व्रत और निर्भीक पुरूष थे, इस प्रकार तीनो पीढ़ियों का इन पर विशेष प्रभाव पडा। वे आगे चलकर बवृढ़प्रतिज्ञ और महान पराक्रमी बने। बचपन में देखे गये नाटक सत्यवादी हरिश्चन्द्र! ओर पितृभक्त




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