हिंदी भाषा की शिक्षण विधि | Hindi Bhasha Ki Shikshan Vidhi

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Hindi Bhasha Ki Shikshan Vidhi by शत्रुध्न प्रसाद सिन्हा - Shatrudhna Prasad Sinha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ हिन्दी-माषा की शिक्षण-विधि (घ) भाषा ज्ञानाजंन का एक विरिष्ट साधनहै। (डः) भाषा मानसिक शान्ति और अलौकिक आनन्द का स्रोत है ! (च) भाषा राष्ट्रीय भावना का प्रतीत है। (क) भाषा भाव-प्रकाशन का सरलतम साधन हे--विश्व के सभी जीवध।रियों के लिये भाव प्रकाशन एक स्वाभाविकं प्रक्रिया है, एक नैसमिक पुकार है। यही प्रकाशन कई रूप ग्रहण करता है। यही মিল जीवधारी की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए विचारणीय है । पशु-पक्षी की प्रारम्भिक या एकमात्र आवश्यकता उसकी भूख शान्ति, शरीर रक्षा तथा जाति रक्षा से सम्बन्धित है। यह किसी प्रकार से भी देखने से उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की कोटि में आता है। अ्रतएव इनका भाव-प्रकराशन केवल इन्ही श्रावश्यकताओो की पूति की सीमा से नियत्रित रहता है । इन आवश्यकताश्रों की पूत्ति के लिये जानवर भी अपने भाव प्रकाशित करते हैं जिसका एकमात्र माध्यम उनकी 'पुकार' है। हाथी का चिग्घारना, घोड़ों का हिन॒हिनाना, गायों की डकार, पक्षी का कलरव उनके भाव-प्रकाशन के ही विभिन्‍न माध्यम हैं। इस नैसगिक-प्रक्रिया के भर सामाजिक वातावरण के अनुसार पशु जिस माध्यम का प्रयोग करते हैं उन्हें हम साहचर्य और पर्यवेक्षण से पहचान लेते हैं। इसके अभाव में उनकी बोली पकड़ना भी असभव है । मनुष्य का स्थान सभी जीवधारियों में सर्वोच्च है। उसका विचार, कल्पना और तक की शक्ति ही उसकी एकमात्र विदोपत्ता है जिसके बल पर वह इस स्थान पर प्रतिष्ठित है । मनुष्य के भाव-प्रकाशन की. प्रेरणा उसकी शारीरिक श्रावश्यकताशों के साथ ही मानसिक मांगों ( (00५1॥08 ) से भी मिलती है । उसके भाव-प्रकाशन न केवल भूख की शान्ति, प्राण रक्षा या जाति रक्षा से सम्बन्धित है वरन्‌ उसके मस्तिष्क के विचार, तकं, चिन्तन, दिल कीं उमंग, उमरण तथा उसाँस से भी पूर्णतया उत्प्रेरित होते हैं। इन भावों के प्रकाशन के निमित्त उसे एक माध्यम की आवश्यकता प्रतीत होती है । उसे उसका सहारा लेना पडता ह! वाणी ही इसका एकमात्र सहारा और आवश्यकताओं का एकमात्र पूरक है। वाणी के अ्रभाव में उसका प्रकाशन संभव नहीं । . गूँगों को वाणी का जो श्रभिशाप मिलता है उसके कारण उनके मनोगत तथा प्रारम्भिक आवश्यकता की पृत्ति केवल मात्र इशारा द्वारा होता है।




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