प्राचीन वार्ता रहस्य - भाग 3 | Pracheen Varta Rahasaya - Voll III

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Pracheen Varta Rahasaya - Voll III by द्वारकादास पुरुषोत्तमदास परिख - Dwarkadas Purushottamdas Parikh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ सो सेठ पुरुषोत्तमदास सों कहे, तुम दंदवत्‌ नमस्कार नांहि किए ? श्रीकृष्णस्मरण करि उठि चले सो उचित नांदी। तब सेठ पुरुषात्तमदास ने कही, हमारे इन के भगवत्‌-स्मरण को ब्योहार है । तुम पूछि लीजो । तुभ सो নিহত महदेव- जी करगे । सो उन जक्षणन में एक आश्यण महदेवजी को कृपापात्र हतो । षो उन ब्रह्मण सौ महादेवजी ते कदी । ओ- इमने सेट सों महाप्रकषाद भाग्यो हतो । हमारे इनके भगवत्‌-स्मरन की ब्योद्दार ही दे। तातें इन सें। ओर कछु मति कहियों। ता पद्ध बडे उत्सव के पाछुं महाग्रध्ाद विस्वेस्वर महादेव को ले जातें । भाव प्रकाश- बह कहिवे को अ्भिप्राय यद्द जो- অতি पुरुषोत्तमदास अच सबक भप तब इनकी आशा में सिगरे लोग दव्य अथं रं। सो प्रहादेवडो ने जाने जो अब सिशरे अनन्य दोइगें। तो हमारो मदातम हूं घि जायगो, और भगबद आशा कलिकाल शआयो, सो जींबन को वहिमुंख करने हैं ।# ओर सट पुरुषोत्तमदास ने भक्ति फैला छो एनसो तो कलु चज्ञे नादी । सब महादेवजी ने यद उपा क्षियो, जो- सेरजी গতর হে] দা হা [লীলা मद्दा बाद्दो ! मोइनाथसुरद्धिपामू। ` पाषरडाचरण धर्म कुरुष्व खुर सन्तम ?1% एसे पुराशदि में कह्टे हुए अनेक वाक्य अजञ् स्मरणोय हैं। सम्पादक




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