दिव्यालोक स्मारिका | Divyalok Smarika

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Divyalok Smarika by अखिल बंसल - Akhil Bansal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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, , दहेजप्रथा-अधिनियम ओर मानव এ £ कु कफ --डा० अरविन्दकुमार जैन (भागलपुर) ` जहा एक श्रोर देश.प्रगति के पथ पर उन्मरुख. है, तो दूसरी शोर श्रन्ध- विश्वास और पुराने रीति रिवाज द्र्‌ तगति से चारों तरफ फैलकर सुगन्धित वातावरण को दूषित कर रहे है। श्राज देश मे समस्याञ्रो को विना सुलभाये कैसे देश को महान बनाया जा सकता है | देश मे समस्याओं का जाल सा फैला हुआ है। जैसे निर्धभता और बेकारी की समस्या से जुडी,हुयी वैवाहिक समस्या भी है । जिसे देहज प्रथा के नाम से जानते है । यह बहुत ही जटिल एवं गम्भीर समस्या है। आज के वैज्ञानिक युग मे इस समस्या ने विकराल रूप घारण कर लिया हे । प्राचीन समय में विवाह के समय कनन्‍्यापक्ष द्वारा वरपक्ष को जो कुछ धन एवं वस्तुएं उपहार या भेट में प्रदान की जाती है -उसी का नाम आचीन लोगो ने दहेज रखा । धीरे धीरे यही। एक प्रथा का रूप,हो गया । प्राचीन समय से दहेज मे यह धन कन्या पक्ष को श्रोर से वर पक्ष को अ्रपनी इच्छानुसार दिया जाता था। परन्तु श्राधुनिक समय में धन का अ्रधिक श्राथिक महत्व बढ जाने के कारण एवं घनाभाव होने के कारण लोगो ने देहज को एक प्रथा के रूप मे बदल दिया । ইনু श्राजकल एक रश्म (शंतं) बन गयी हे ।'इस रश्म'ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है जिसे यदि जड से नष्ट न किया जाय तो यह मानव समाज के लिये अभिशाप सिद्ध हो सकती है। वेद भ्रादि पुराणोके श्रनुसार मानव विवाह एक सर्वोत्कृष्ट यज्ञ है। दो ्रात्माऐं श्रपना अपना स्वतन्र अस्तित्व खोकर' एक दूसरे मे विलीन हो जाती है । एक झात्मा का दूसरी में लय हो जाना अपने ,स्वतत्र श्रस्तित्व को समाप्त कर, दूसरे के व्यक्तित्व मे घुल जाना मावव प्राणी “के द्वाराः हौ सकने वाले उत्कृष्ट पुरुषार्थ यज्ञ कहा गया । फिर इस मगल कायं मे दहेज रूपी दानव का क्या स्थान है ? भ्राज के युवा वर्ग को यह दानव भ्रपना शिकार क्यो वना रहा है दहेज प्रथा का आधुनिक युग मे क्या स्थान है । वह्‌ यह है-- दे ~ ५ ঃ कंसी शादी ' है, कितना देहज चढता है, किसी का सूर्य ढलता है, किसी के घर निकलता है । गा




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