आधुनिक हिंदी काव्य मे नारी भावना | Adhunik Hindi Kavya Me Nari Bhavna

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Adhunik Hindi Kavya Me Nari Bhavna by धीरेन्द्र वर्मा - Dheerendra Verma

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about धीरेन्द्र वर्मा - Dheerendra Verma

Add Infomation AboutDheerendra Verma

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
भूमिका ] ह हु রা ( ३ )इृष्णोपासक भक्तों की, जिसके प्रमुख कवि सर दें और ( ४ ) प्रेममार्मियों की, जिसके प्रमुख कवि जायसी हैं | साम्यदायिक-दृष्टि से इन चारों में चाहे जो भी भेद रहा दो; किन्ठ नारी इन सबका दृष्टिकोश एक হী, টা एराशों में नारी फे दो रूप दिखाई, पड़ते हैं; सामान्य सथा ` नोभे क सामान्य या यथार्थ रूप के सम्बन्ध में सभी भक्त-कवि एक स्वर से घ॒णा- स्मक्र-भाषना को अगिग्यंजना करते हैं | यद् भाषना क्रोध और दिता से भरी हुई है। भक्त- कवियों ने नारी को शआाध्यात्मिक मार्ग की वाघा फे रूप में देखा हे ।* इसीलिए उसे भ्रप्ट करनेवाली माया का ही साक्षातत्‌ रूप माना है 1* छसमे सोत्र आाक्पंण दे, किन्तु सन्‍त को झससे दूर रहने फे लिए. इन कबियों ने बार-बार चेतावनी दी ই 1৯ বহাল भक्त कवियों ने. नारी को 'सर्पिणी”, 'वाधितीः, “पैठी छुरी?, “विप की वेनि वदि. विशद. दिष्‌ ह । भक्त कवियों का विश्वास है कि स्त्री में काम-प्रच॒त्ति अ्रध्यन्त प्रवत्ल होती दे, इसलिए बुद्धा तथा जननी पर भी विश्वास करना वे उचित नहीं समभधे *' और छोटी-मोटी कामिनी सब दी की विप की बेलि क्ते ६ प्रेम के छेत्र में भी नारी को स्थिर तथा छलपृख माना गया है भक्छ-कवि नारे फो श्रत्यम्त नोच तथा कथष्टी मानते ई, जो श्रपनी नीच इच्छाश्रो की पूति फे लिए सव कुछ कर सकती ९ ।> यद उ्तको शक्कि्मां दम्य हैं, पुरुष उसको समझ पाने में असमर्थ रहता है ।* नारी को इतना र्गो से युक्त द्यौर्‌ श्रविश्वन्ननीय मानते हुए. कवि दोल-गंबार और पशु तक से लसकी तुलना कर देता है और ताड़ना का सहज अधि- कारी बता देता है ।१० ~ +सूरदास--सुरसधाः वकाम क्रोध“ और पद्‌ १७, ए०,< 1 घही---“बौरेसन ' * ***बौरह्ना”! पद्‌ १८२७ ४० हे१ ! कचीर--^चस्ती-चलौ ~“ ---दोय,” स० वा० सरं= भार १, दोदा १, ए० ७छट | वटी (नारी-मवावै- * कोय, दोहा < शु ५८ ॥ य्दुलसो--राम चरित मनस, चृतीष सोपम्न ददा ७६-७७ ५ ३२० | उ वही--देटा ८० ० ३२६ ॥ अब्रही--अआ्रत्ता' * ****विल्योकी ?, दोहा २५, छ+ २.९९ | ९ लद---सं० बा> सँ० भाग, १, दोदा १-२ > २२३॥ ष्कयीर- सं० चः० संन भाग १, दोहा १४ ए० ৭1 ७ धूरदास---खूरसागर, समवस स्फंध, पद ४४६ । प्युतसी--रामचरित मसामझछ, कित्तीय सोपान, बोडा ४८, इ> १७६ भ्वष्टी-र५थयपि' * अनणा दोष्धा २५२८० १६८} १०वष्टी--शॉच रा सोपान, ० २३६६ |




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now