कविवर विनयचन्द्र और उनका संहिता | Kavivar Vinaychandra Aur Unka Sanhit

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Kavivar Vinaychandra Aur Unka Sanhit by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
¬= ] गहूँडो इसी प्रन्थ के पर ८४ में प्रकाशित दे दिसमें श्रापन আব্দার মী जिनपमंसूरि के पह पर प्रीजिनवद्रसूरिके पाट भिराशने का षक्टेख किया है। बह पद महोत्सब दोकानेर के छणकरणसर में हुआ था अतः इसके वाद चार्य भी ने भ्रापके गुरु मद्दारास का गुजरात में विचरने का क्रादेश दिया प्रतीत दाता है। इस फऊृपु रचना में अपने को कवि ने मुनि पिनमचद्र छिस्ला है इसके बाद झापने झपु कृतियां अवश्य डी बनाई होगी क्योंकि बइत्तमकुमार चरित्र में खापने झपने को कई जगह कृषि, विरोपण से सम्बोधित किया है। पाटण में रहते झापने वाड़ी पास्‍्व स्त० व नारगपुर पाररष स्तबनादि की रचना की। इसके बाद स १७५५ चातुर्मास आपने राजनगर किया कौर बिजयादशमी के दिन विहरमान थीसो रचकर पूण की । दूसरा चातुर्मास मो आपने राजनगर में ही घिदाया था स्पूसि- मद्र षारहमासागा ११ षी रषना राजनगर मे हर्‌ । सं० १५.८८ मा०थ० १ को राजनगर ( सदमद्ावाव्‌ ) में ११ मंग আল্লা का रचना पथ विशयादइशमी के दिन चोबीसी की रचना पूर्ण को। इस चातुर्मास के पाचात्‌ आपने श्राचाय प्री जिनचन्त्र सूरिजी पर्व क्षपन दादा गुर भो इपनिधान पाठक ब गुर प्रान दिरूकादि रुर्वनो क साथ मपरिबार मिली पोपषदी १० के दिन शप्रुंजय मद्दातीय की यात्रा की जिसफा टस्सेश् भापन एसी प्रन्ष क॒ पृ < मे प्रकाशित शत्रुंजय यात्रा स्व०गा २९१में किया है एक ओर गा० १३ का स्तन पृ ५६ में प्रकाशित है।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now