अनुभूति के आलोक मैं | Anubhati ke Alok Mei

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Anubhati ke Alok Mei by डॉ देवेन्द्रकुमार शास्त्री

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भात्मा ही परमात्मा है : परमात्मा का दर्शन करने से पूर्व आत्मा का दर्शन करना अत्यन्त जरूरी है. जो आत्मा का दर्शन नही कर सकता, वह परमात्मा का दर्शन कैसे करेगा ? वस्तुत. आत्मा और परमात्मा' मे एक आवरण का ही अच्तर हं मोह का आवरण जब तक है, आत्मा सुप्त-परमात्मा है. मोह का आवरण हटा कि आत्मा मे ही परमात्मा जागृत हो जाता है. धमं का वीज. धर्मरूप महावृक्ष का वीज है--सरलता ! सरलता के वीज को जब प्रज्ञा का जल सीचा जाता है, तो जीवन वन मे धमं का महावृक्ष लहलहाने लगता है. पवित्रता का मूल : पवित्रता का मूल सदाचार है. ह सदाचार के अभाव में पवित्रता की आशा करना वैसा ही है, जैसा जल के अभाव मे शीतलता की आशा ! शुद्धि और सिद्धि : शुद्धि के विना सिद्धि नही मिल सकती जहाँ शुद्धि है वही सिद्धि है




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