मीराबाई की जीवनी | Mirabai Ki Jeevni

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Mirabai Ki Jeevni  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ १३ ) राणने समभावो जावो, में तो बात न मानी सीरके प्रयु गिरधर नागर संतां हाथ विकानी । उदावाई--भामी वोरो यचन विचारी । साधो की संगत दुख भारी, मानो बात हमारी] छापा तिलक गलहार उतारो, पहिरो हार हजारी | रतन जड़ित पहिरो आभूषण, भोगो भोग अपारी। मीरांजी थे चलो महख्मे, थनि सोगन म्हारी । ` मीराबाई-- माव भगत भूषण सजे, सीख संतां सिगार । ओढ़ी चूनर प्रेमकी; गिरधरजी भरतार ऊदाबाई मन समझ, जावो अपने धाम | राजपाट भोगो तुम्दी, हम न तासं काम 1१ विषका प्याला राणाने कुपित होकर विष भरा प्याछा भेजा, पर मीरां उसे चरणामृत मानकर पी गई : | विषकों प्याछा राणाजी मेल्यो, यो मेडतणीने पाय । कर चरणामृत पी गई रे, गुण गोविंद रागाय ।२ राणाने पिटारेमें सांप भरकर भेजा, पर मीरनि जब उसे गले में डाछा, तो हार बन गया : ५ भ ৬. सांप पिटारो राणाजी भेज्यां, थो मेड़तणी गल डार। हँस-हँस मीरा कंठ छगायो, यो तो म्हांरे नोसर हार ।३ एक अन्य पदसें संकेत है. कि मीरांतते जब सांपका पिटारा छुआ; तो उसमें शालिग्राम निकले :




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