रुषमणी हरण | Rushmani Haran

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
176
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)1 १९ ]के प्रत्येक दहै मे जौ वीरत्व का भावना है, भौर उमग ह वह राजस्थान को मौलिक
निधि है और समस्त मारतवर्ष के गौरव का विषय है ॥
--विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ।
“राजस्थानी वीरों की भाषा है; राजस्थानी साहित्य वीर-साहित्य है । ससार के
साहित्य मे उसका निराला स्थान है। वर्तमान काल के भारतीय नवयुवको के लिए तो
उसका अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। इस प्राण मरे साहित्य औौर उसकी भाषा
के उद्धार का कार्य भत्यन्त जावश्यक है | . मैं उस दिन की प्रतीक्षा मे हु जब हिन्दू
विश्वविद्यालय मे राजस्थानी का सर्वांगपूर्ण विमाग स्थापित हो जायेगा जिसमे राजस्थानी
भाषा श्रौर साहित्य की सरोज तथा अध्ययन का पूर्ण प्रबन्ध होगा ।”
-- महामना प० मदनमोहन मालवीय 1৭
“साहित्य की दृष्टि से मी चारणी कृतियाँ बडी महत्त्वपर्णा है। उनका अपना
साहित्यिक मूल्य है भौर कुल मित्रा कर वे णेसी साहित्यिक निधियाँ है जो अधिक प्रकाश
में आने पर भाधुनिक भारतीय माषाभौ के साहित्य मे वश्य ही भत्यन्त महत्त्व का
स्थान प्राप्त करेगी ।” --थी श्राशुतोष मुकर्जी 1
राजस्थानी भाषा-साहित्य का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा
सकता है-१ जेन साहित्य, २ डिगल सहित्य, ३. पिगल साहित्य, ४ पौराणिक
साहित्य, ५. भक्ति एव सन्त साहित्य, ६. लोक-साहित्य श्रौर ७ भ्राधुनिक
साहित्य ।राजस्थानी जेन साहित्य को प्रमुख विशेषताएँ ह प्राचीनता, पच-रूपो की
विविधता, गद्य की प्रचुरता और जीवन को उच्च ध्येय की ओर भ्रग्रसर करने
की क्षमता। जन साहित्य के प्रमुख प्रणेता सामान्य सासारिक जीव नही,
चरन् जीवन के विस्तृत भ्रतुभवो से युक्त और साधना के उच्च धरातल पर पहुंचे
हुए ज्ञानी महात्मा रहे हैः प्रतएव जेन साहित्य शुद्ध साहित्यिक तत्त्वो से युक्त
होता हुआ भी उपदेश-तत्त्वो से पूर्ण है ।जन साहित्य केवल घामिक विषयो पर ही नही रचा गया, वरन् वैद्यक,१) (कफ) सॉडन रिव्यू, कलकत्ता, सितम्बर, १६९३८, जिल्द ६४, पु० ७१० ।
(ख) नागरी प्रचांरिणी पन्निका, घाराणसी, भाग ४५, श्रक ३, कातिक स० १९९७,
पु० २२८-३०।
> ठाकर रामसिहजी का श्रध्यक्षीय श्रभिभाषण, प्रखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य
सम्मेलन, दिनाजपुर, वेशाख स० २००१, पृ० ११-१२॥
3 ठाफूर रामसिहजी का श्रध्यक्षीय श्रभिभाषण, श्रखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य
सम्मेलन, दिनाजपुर, वेशाख, स० २००१, पु० ११-१२।
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