जैन तत्त्व शोधक ग्रंथ | Jain Tattva Shodhak Granth

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
230
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ३9
२, लक्षण हार
दूसरे लक्षण द्वार में इन तत्वों के लक्षण बताये हैं :-
(१) जीव का लक्षण चेतन होता है ।
(२) अचेतना रक्षण अजीव का ই।
(३) जिन कर्मोये जीव को सुख प्राप्त होवे वह
. पुण्य कहलाता है ।
(७) जिन कर्मो' से जीव को दुःख प्राप्त होवे वह
पाप कहलाता है |
(५४) शुभा शुभ कर्मों के आने को आश्रव कहते हें ।
(६) आते हुये कर्मो' को रोकने की क्रिया का नाम
संवर ह ।(७) पूर्वोधार्जित कर्मो को क्षय करने की क्रिया फी
' निजरा कहते हैं ।
(८) जिन क्रियाओं से शुभ अथवा अशुभ कर्मों का
वघ हो वह वन्ध कहलाता है।(९) शुभा शुभ कमो से जीव की युक्तावस्थाका नमे
লীম ইन--४ हितीय द्वार समाप्तम् --
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