जैन तत्त्व शोधक ग्रंथ | Jain Tattva Shodhak Granth

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Jain Tattva Shodhak Granth by मदनसिंह कुम्मट - Madansingh Kummat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ३9 २, लक्षण हार दूसरे लक्षण द्वार में इन तत्वों के लक्षण बताये हैं :- (१) जीव का लक्षण चेतन होता है । (२) अचेतना रक्षण अजीव का ই। (३) जिन कर्मोये जीव को सुख प्राप्त होवे वह . पुण्य कहलाता है । (७) जिन कर्मो' से जीव को दुःख प्राप्त होवे वह पाप कहलाता है | (५४) शुभा शुभ कर्मों के आने को आश्रव कहते हें । (६) आते हुये कर्मो' को रोकने की क्रिया का नाम संवर ह । (७) पूर्वोधार्जित कर्मो को क्षय करने की क्रिया फी ' निजरा कहते हैं । (८) जिन क्रियाओं से शुभ अथवा अशुभ कर्मों का वघ हो वह वन्ध कहलाता है। (९) शुभा शुभ कमो से जीव की युक्तावस्थाका नमे লীম ই न --४ हितीय द्वार समाप्तम्‌ --




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