पहला परिच्छेद | Pehla Paricched

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Pehla Paricched by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१७ दूसरा परिच्छेद साय और ताज़े-तगढ़े आदर्सियो के साथ , सैनिकों के साथ औौर जागरिकों के साथ ; विद्याथियों के साथ भर निरे स्कृत्ती छोकरो के साथ--सभी श्रेणियो, आचरणों झऔर शआयु चाले व्यक्तियों के साय श्रयन्त वीभत्म और चिवेकहीन भावे से क्राञ्ुकता का दौर- दौरा चलता। शाम से सुबद्द तक बराबर णोर-गुल, दही-मज्ञाक, शाना-घजाना, सिगरेट-शराब--बीच में ज़रा सी विश्राम का नाम नही--ओर इसके बाद घोर निद्रा। इसी सिलसिसे में दिन पर दिल निकल जाते और हफ्ता पूरा हो जाता। हफ्ते की समाप्ति पर सरकार द्वारा संस्थापित पुलिस के थाने में जाना होता । वहाँ सरकार के चेतनभोगी डॉक्टर कसी गम्सीरता और फठोरता के साथ, और कप्ती कौतुकपूर्ण उच्छुद्लता के साथ इन श्रीरतो की आँच-पडताल के बहाने डस स्वर्गीय सलजता की हव्या करते, जिसे प्रकृति ने न केवल मजुप्यो को दी आत्मस्त्षा के लिए दी है, वल्डि वडी व्यालुतापूर्तकत पशु-पक्षियों तक को प्रदान की है। इसके बाद सरकारी डॉक्यर उन औरतों को उस जघन्य पापका सिलसिला जारी रखने की लिखित अनुमति देते, जो पिछले हफ्ते थे और उनके यार करते रहे थे। इसऊे बार फिर वैसा हो सप्ताह पआ्राता । क्या गर्मी, क्या जाडढ़ा, क्या काम के दिन और क्या छुटी के दिन, सारी रात वद्दी व्यापार चलता रहता । कट्दशा ससलोचा ने अपने सात साल इसी तरद्द बिचाए । इस अन्तर में उसने दो-एक बार मकान बदले, और एक यार घस्पताल की भी यात्रा कर आईं। सातवे साल--जषर वह अद्वाइस अरख की हो चद्धी--बह घदना घटित हुईं, जिसके लिए उसे जेल | 9




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