सरदार वल्लभभाई के नाम | Sardar Vallabhbhai Ke Naam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“भले ही जिस समय सरदार और में अलग-अलग मार्गौ प्र जाते दिखाओ देते हों, परंतु जिससे हमारे हृदय थोड़े ही অভ हो जाते हैं ? में अन्हें अलग होनेसे रोक सकता. था। परंतु असा करना मुझे ठीक नहीं लगा | . . . अगर नये मालूम होनेवाले क्षेत्रमें अहिसाका प्रयोग सफल कर दिखानेकी मुझमें शक्ति होगी, तो मेरी श्रद्धा टिकी रहेगी । जनताके वारेमें मेरी राय सही होगी, तो राजाजी और सरदार पहलेकी तरह ही मेरे पक्षमें हाथ आ्रुठायेंगे। मे % च “ काग्रेस कार्यसमितिने माना किं भीतरी झ्नगड़ोंमें तो अहिंसासे काम लेना अब भी संभव है, परंतु वाहरसे चढ़कर आनेवाले शत्रुके विरुद्ध अहिसासे लड़नेकी शक्ति हिन्दुस्तानमें नहीं हं । यिस अविद्वाससे मुझे दुःख होता है। में नहीं मानता कि हिन्दुस्तानके करोड़ों निः:शस्त्र छोग जिस व्यापक क्षेत्रमें अहिसाका प्रयोग सफर नहीं कर॒ सकते । जिनके नाम कम्रेसके रजिस्टरमें हैं, वे सरदार जैसे विचलित श्रद्धावाले सरदारको अपना विश्वास बताकर आश्वासन दे सकते हैं कि अहिसा ही हिल्दुस्तानके अनुकूल ओेकमात्र हथियार ই |. . . . / असलिये में आशा रखता हूं कि प्रत्येक गुजराती स्त्री- पुरुष अहिंसासे चिपटे रहकर सरदारकीौ विश्वास दिलायेगा कि बह कभी हिंसक बलका प्रयोग नहीं करेगा। और हिंसक वरूका प्रयोग करनेसे जीत होनेकी आशा हो तो भी वह असे छोड़ देगा गौर कभी अदिसक वरुका त्याग नहीं करेगा। हम भूलें करते-करते ही भूलें न करना सीखेंगे। जितनी वार गिरेंगे सुतनी ही वार अुठेंगे। ” “ हरिजनवंधु ' के भुसी अंकर्में दिल्‍लीका प्रस्ताव ' शीर्षक लेखमें वापूजीने कहा: १७




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