जैसलमेर हैण्डरिटेन मनुस्क्रिप्ट्स कैटेलॉग [खंड 2] | Jaisalmer Handwritten Manuscripts Catalogue [Vol. 2]

Jaisalmer Handwritten Manuscripts Catalogue [Vol. 2] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[9 9 ( 13 ) पश्चिमी राजस्थान व गुजरात इस भू-माग की भाषा विक्रम की लगभग 18वी शताब्दी तक्र प्राय एक सी ही रही है झौर उप्तमे विपुल साहित्य रचा गया है ! अ्पश्र श भाषा के काल के बाद, अ्रदेश की इस भाषा की क्या नाम दिया जावे इस वारे में विद्वान एक मत नही-हैं। चू कि विगत दो ढाई शताबव्दियो से राजस्थाती व गुजराती भिन्न-भिन्न भाषाशओ्रो के रूप मे उभरी हैं श्रत उस प्रभाव में श्राकर प्रादेशिक व्यामोह के कारण 13वी से 18वीं इन 5-6 क्षताब्दियों मे रचे गये ग्रन्थो की भापा को कई लोग तो गुजराती या प्राचीन गुजराती कहते हैं झौर कई लोग राजस्थानी कहते हैं। उदाहरण स्वरूप श्रहमदाबाद (गुजरात) से चये सूचीपत्रोमे श्री समय सुन्दरजी के ग्रथो की भाषा को स्व॒श्रागमप्रभाकर मुनि पुण्यविजयजी ने ग्रुजराती बताई है जबकि जोधपुर (राजस्थान) से छपे सूची पत्नो मे उन्ही ग्रथो की भाषा स्व ॒ पद्म श्री मुनि जिनविजयजी ते राजस्थानी बताई है। इस समग्र भू-भाग मे विचरण करने वाले होने के कारण जैन साधुग्रो द्वारा रचित जन साहित्य में तो यह भाषा- एक्यता व साम्य इतना श्रधिक है कि भाषा भेद की कल्पना ही हास्यास्पद लगती है। ग्रथकर्तता ने स्वय की वोली में रचना की, उस बोली को पराई सज्ञा देकर श्रन्याय नही करना चाहिये, श्रत इस भाषा विवाद भे न पडकर हमने मध्यम मागे का ्रनुसरण करता हो श्रेयस्कर समझा है शौर कुवलयमाला नामक प्रमिद्ध ग्रथ मे सुकाये गये “मार गुर्जर! नाम से इस भाषा को वताया है जिसमे 19वी शताव्दी से पूर्व की लगभग 5-6 शएतान्दियो को इस भू-भाग की बोलचाल किवा साहित्यिक भाषा का समावेश्व हो गया है । इस प्रकार उपरोक्त सात स्तम्शो मे ग्रथ सवन्धी जानकारी के सकेतो का स्पष्टीकरण के वाद श्रव তন सस्‍्तम्भो का विवेचन किया जता है जो मुख्यत प्रस्तुत प्रति से ही सम्बन्धित हैं । स्तम्भ 8- पन्नों की सख्या -- इस स्तम्भ में प्रति के कुल पन्नो की शुद्ध सख्या जो है वह लिख दी गई है जिसको दिगुणित करने से पृष्ठो की सरया श्रा जाती है। घया सभव पन्नों को गिनकर सही सर्पा लिखी गई है श्लोर बीच में जो पन्ने कम है अथवा भ्रतिरिक्त हैं उन क्रमाकों की टिप्पणी दे दी गई है । अधूरी या प्रपुर्ण तथा क्ही-कही चुटक प्रति के भी पन्नो के क्रमाडू जो उपलब्ध है श्रथवा कम है, वीगतवार लिख दिग्रे हैं। जहाँ एक से श्रधिक प्रतियो की प्रविष्टि एक साथ की गई है वह्दा प्रत्येक प्रति के पन्नों की सख्या अलग-अलग लिखी गई है जिनका क्रम विभागीय क्रमाकानुमार है, ऐसा समभ लेना चाहिये । स्तम्भ 88- नाप -- हु इस स्तम्भ मे प्रति के वारे मे चार प्रकार से सूचना दी गई है। पहिली सख्या प्रति की लम्पाई और दूसरी सख्या प्रति की चौडाई दर्शाती है, जो दोनो सेन्टीमीटरो में है। तीसरी सख्या प्रतिपृष्ठ (न कि प्रति पन्ने मे) कितदी पक्तिया है, यह बताती है भौर चौथी सख्या प्रति पक्ति श्रौसतन कितने अक्षर हैं, यह दिखाती हैं। चारो सख्याश्रो को इसी क्रम से लिखा है झौर उन्हें प्रलग-2 करने हेतु सुविधा के लिये वीच में ' «” निशान लगा दिया है । जहा ग्रस्थ केवल यन्त्र या तालिका स्वरूप ही है वहाँ लकीरो व अक्षरों को सख्या नही दी है । तथा जहा प्रति पचपाठी ([प्रर्थात्‌ वीच में मूल ग्रथ व उसके चारो शोर इत्ति प्रादि लिली हू) या टब्चार्थ सह्दित है वहां पत्तियों व भ्रक्षरों की सख्या मूल की ही दी हैं। जहाँ एक से श्रधिक ग्रतियो की प्रविष्टि एक साथ में की गई हैं वहाँ केवल प्रतियों की लम्बाई व चौडाई ही दी है भौर वे भी जब प्रति प्रति भिन्न है तो लम्बाई व चौडाई दोनो की लघतम व दीघेतम दो-दो सस्यायें लिख दी गई दै । इष्टात--भाग 3 (भ्रा) भक्तामर स्तोत्र 5 प्रतियो की श्रविष्टि के सामने 24 से 27 /८ 12 से 13 लिखने का तात्पयं यह है कि इन पाचो प्रतियो की लम्बाई भिन्न-भिन्न है जो नीचे मे 24 भ्रौर ऊचे में 27 सेन्टीमीटर है और इसी प्रकार चौडाई मी भिन्न-2 है जो नीचे मे 12 और ऊचे में 13 सेन्टीमीटर है। चू कि सेन्टीमीटर भी कोई वहुत विस्तावार वाली टूरी नही है अत हमने मीलीमीटरो मे जाना श्रेयस्कर नही समझा हैं--झाधे से श्रधिक को पूरा सेन्टीमीटर गिन लिया है और आये से कम को छोड दिया है |




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