आप्तमीमांसा प्रवचन | Aptmimansa Prawachan

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Aptmimansa Prawachan by बैजनाथ जैन - Baijnath Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम भाग {8 ११ तीर्थकरता रूप साधत किक प्रमगणसे सिद्धहै ? प्रत्यक्ष प्रमारुसेतो सिद्धो नही सकता पफ्योकि प्रत्यक्षा यह्‌ तिष्य नहीहैकि तीथे$रताके' रहस्यफो जान सके, साध्यकी तरह । उसे फि इसप्रयोगमे यह प्रभु महान है, इस महता फो सिद्धि प्रत्यक्षसे नही होती है इसी प्रकार तीर्थंकर होनेके कारण महान है, इस तीर्थकरताकी भी सिद्धि प्रत्यक्षसे नहीं होती, भौर भनुमानसे सो हसं साधनकी सिद्धि नही है, क्योकि साध्या भ्रविनासावो लिद्धका अभाव होनेसे । साघ्य ह यष्ट महत्त्वे 1 ये ' प्रभु महान हैं, ये श्राप्र है हम प्रकार महत्व साध्यकी भिद्धि कर सकने वाले महत्त्वकः भ्रविनाभाव लिङ्ख नही है यह पी्थंकण्ता । ण्व क्षकाकार फटता है कि यह घात आगमस्ते तो सिद्ध हो नाती है । प्रागमभे वंन है, तीर्थंकर होति हि, उनके षर्याणक होते है, इद्र उत्सव मनाता हैं, तो भागममे जब तीर्थकर होनेका वान है तो उससे तीर्थकरता फी सिद्धि तो हो जायगी झौर तीर्थकरपना सिद्ध होनेसे महत्ता घिद् हो जायगो । उत्तरमे फहते हैं कि श्रांगमसे यदि तीर्थकरपनेकी सिद्धि मानते हो तो वह तो झागमाश्रय है । उस आागमर्मे प्रमाणता कहाँ है श्रभो | जो झागमके श्राश्रय हेतु होता है हेतुकी दार्शनिक क्षेत्रमें भ्रतिषठा नही होती, क्योकि कोई श्रपने माने हुए श्रागमका हेतु दे और उसे हूसरा न माने तो सिद्धि तो न हो सकी । तो आ्रागमप्ते लिया है वुछ वह प्रमाश देकर छिसीको ग्रपता मतव्य सिद्ध कर सके सो बात नहीं बन सकती है। यह तो केवल श्रद्धालु पुरुषोके बोचकी बोत है। एक ही मतके श्रद्धात करने चाले लोग हैँ वे झपसमें भले ही भ्रागमका प्रमाण देकर दुसरेको कुछ समझायें, लेकिन ध्रागमकी प्रमाणताको तो दूसरे लोग, प्रतिचादीजन नही मान सकते । तो इस हेतुसे यदि महत्ता सिद्ध करनी चाहते हो तौ यहं हतु भ्रागमाश्चित्त हि, भ्रागममे लिला , केबल গন मात्स सिद्ध कियाजा रका {तो श्रागमाश्रय होनेसे हेतु भरगमक रहा । साध्यो सिद्ध करतेमे समर्थ न रहा । प्रभुमकत्तकी सिद्धिमे दिये गये हेतुमे व्यभिचार--तोथे सम्प्रदाय' चलानेके कारण भ्रभु पहान है यो प्रभुमहत्ता सिद्ध करनेमे दिये गये हेतुमे व्यभिषार दोष भी भाता है । भर्थात्‌ जो हेतु विपक्षमे रहे उसे व्यभिचारी हेत कहते ह । यहा साघ्य है किसी महानकी प्रापतामहत्त सिद्ध करना नहीं श्रौर हेतु दिया था रहा है कि चह तोथेदडूर है तो तीथेद्धूरपना भ्रापपनेको सिद्ध करता । यद्यपि तीथेद्धुरपता इन्द्रा- दिकमे नही मौजूद है इसलिए जैसे कि पहिले दो छन्दोमे वाथा है कि श्रन्तरग शारोरिक भ्रतिदय देधोके भी है इस कारण घह हेतु न्यभिचारो है। तो यह तोथ- ज्ूरपना देवेन्द्रोमे भी पाया जाता हो शौर उससे फिर व्यभिचारी कहा जा रहा हो यह बत्रतो नही है लिकिन सुगत कपिल श्रादिक श्रनेक ऋषियोको लोग झपना तोथंडूर कहते हैं । पर उनमे आप्रता तो नही है । भक्तजन उन्हे त्ींथंद्धूरपना तो सानते है, पर वे श्रा तो नदी हैं, क्योकि उनके सिद्धान्तोमे परस्पर विरोध है इ सलिए तो्थड्ूरपना यह हेतु -भशिचारी हेतु है। जैसे कि तीथंडूरका शागरम, तीर्थजूरपने




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