कन्या-शिक्षा-दर्पण | Kanya-Shiksha-Darpan

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Kanya-Shiksha-Darpan by पार्वती देवी - Parwati Devi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कन्या-शिक्षान्दपण श्श्‌ करती, उसकी सब लोग निन्दा करते हैं. आज्ञा न माननेवाली लड़की खुद भी मुष नदीं रहती । क्योंकि ऐसी लडकी पर माता-पिता नाराज रहते हैं और वात-्यात पर उसे डॉट-फटकार बतलाते हैं, इससे लड़की बहुत दुग्बी रहा करती हैं। किन्तु लो लडकी अपने बड़ी की आज्ञा मानती ह, उम पर सच लोग प्रमन्न रहते हैं। यदि उस लड़की से कभी कोई गलती भी दो जाती है तो लोग उस पर विगड़ते नही, वल्कि कोमल ब्य्‌! मे इते उसकी गलती सममत ठेते है । इमे ज्ञा माननेचाती लड़कियों हमेशा खुशदिल रद्दा करनी है। प्रत्यक लड़की का यद्द घात याद कर लेनी चाहिये कि-- “यदि तुम खु रद्दना चाहो तो दूसरो का खुश रखी।”' तो लडकी दूसरा करौ खु रखती है, वह र्बय भी खुद रहती है । जो लडकी दूसरों फो खुश नहीं रुपती, वह खुद भी सुझ नदीं रती । অহ বাহ্‌ হই ছিঃ माता-पिता की सेवा करना तुम्दहांश परम कतेव्य है। क्योकि पुत्र तो अपने माता-पिसा की सेवा जिन्‍्दगों मर करता हैं, पर लुम्हें उदना समय नही मिल सयता। जब तुम अपने पर चली जाओगी, तब माता-पिता पी सेवा कैसे कर सकोगी ? फिर तो माता- पिता का श्ण तुम्दारे सिर पर लदा णद्‌ जायगा । निसने तुम्हे पाल- पोल कर सयानी कव्या, पदाया-लिखाया, वु्दाया मलमूत्र के, उसे प्रति तुम्दाय क्या परतव्य है, इसे तुम अपनी बुद्धि से ही मोच सती ष्टो] ये लड़कियाँ अपराधिनी हैं, जो माता-पिता वी सेवा नहीं करनी और उनरी आस्ता का पालन नहीं करतीं । साता হা পল জী লা में और भा बड़ा है। एड बार भवयने सदर अपनो साता से पूछा-- पा {सने कण्दर दना सेवा वौ, पर यद्‌ स्थिर नही कर सश दि अभी में तुम्दारा ऋण चुशा सझा या नहीं 7० मावा ने श्र दिपा-“येटा \ इनमे पोरे मन्देद्‌ नदी दि तुम




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