महादेवी संस्मरण ग्रन्थ | Mahadevi Sansmaran Granth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रिय सन्ध्य गगने मेरा जौवनं। यह क्षितिज चना धुंघला विरागं नव अरण-अरुण मेरा सुहाग छाया सी वाया वीतराग ও सुधि भीते स्वप्न रेंगीके घन , प्रिय सान्ध्य गयन मेरा जीवन । महादेवी जी माँ-चाप की पहली सतान है। रूदिग्रस्त मारतीय समाज मे आजमी, पर आज के पचारू वर्ष पहले तो निश्चित रूप से प्रथम कम्या-छाम शुभ या सुखद नही माना ज्ञाता था। महादेवी जी ने र्वय इसका उल्लेख किया है--“जैसे ही दवे स्वर से लक्ष्मी के आगमन का समाचार दिया गया वैसे ही घर के एक कोने से दूसरे तक एक दरिद्र निराशा व्याप्त हो गई। वडी-बूढियाँ सकेत से मूब गाने वालियों को जाने वे लिये कह देती और बडेबबूढे इशारे से नीरब वाजे वालों को विदा देते--यदि ऐसे अतिथि का भार उठाना परिवार की शक्ति से वाहर होता, तो उत्त बरेंग लौटा देने वे' उपाय भी सहज थे |” सौमाग्य से इनका जन्म बडी प्रतीक्षा और मनौती वे पश्चात हुआ | इनवे' बावा ने इसे अपनी कुल देवी दुर्गा का विशेष अनुग्रह समझा और आदर प्रदर्शित करने के लिये नाम रखा--महादेवी। साकेतवा1र वी यह उक्ति---सौ सौ पुत्रों से भी अधिक जिनकी पुत्रियाँ पूतशीछा' वास्तव में राजा जनक की पुृत्रियों के लिये जितनी सार्थक है, उतनी ही श्री गोविन्द प्रसाद को पुत्री महादेवी वे लिये भी । महादेवी जी का काव्य करुणा-ककिति-अश्रुसिक्त है| पैदा होते ही रोते तो सव बच्चे हैं, पर इनबी रोने की अदुभुद आदत | माँ--हेमरानी देवी आस्तिक स्वभाव वी भारतीयः नारी होने वै कारण पत्ति को खिलाने-पिलाने का कार्य नौकरों पर न छोड कर स्वय करना चाहती थौ मौर महादेवी जौ इस बीच रो-रोकर कोलाहल मचा देती थी । माँ ने विवशता से परम्परा-प्रचलित अफीम वा सहज सम्बल ग्रहण किया । अफीम खिलायी भौर शूकै पर पडे प्रगे पर डाल दिया । वे अपनी द॑ैमिकी में व्यस्त हो गई और बालिका ने कह्पना-छोक की सैर वी | अफीम-सेबन से हानि जो भी हुई हो पर प्रत्यक्ष छाम यह हुआ कि अन्य शिशुओं को अपेक्षा इनका विकास शीघ्य हुआ । तीन वर्ष की अवस्था में ही आम को पाल से सार चुन लेने में आप निपुण हो गईं । वर्णमाला-ज्ञान के साथ ही भाई-बहन को चिढाने वी करा का प्रदर्शन करने लगी 1 पाँच वर्ष की होते-होते आप को भोपाल तथा इन्दौर की यात्रा भी करनी पडी, जहाँ अतीत के चलचित्र' का रामा इन्हे मिला 4 छोटे भाई की स्पर्धा में साम दाम-दण्ड- मेंद के हारा रामा को आप किस तरह केवल अपने ही लिये राजा कहने को बाध्य कर देती थी, इसकी भी एक रोचव कहानी है । अवस्था की प्रगति के साथ-साथ जीवन-विस्तार महादेवी-सत्मरण-ग्रंय ११




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