भवयान | Bhvayan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Bhvayan by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
भूमिका ९७ याद आती है--' सबही मद माते कोई न जाग।'' “ विशालदेव कहते है कि जगत-कौ सारहीनता को समञ्ो ! मदार के भुज (रोवा) के समान यहा सव कुछ निस्सार तथा चंचल हे ! आशा मात्र ही इसकी सत्यता हे । सेमलफूल के समान ही यह केवल दिखाऊ है । जैसे शून्य भार नहीं पकड सकता, वैसे जगतभोगो मे मनुष्य की महत्वाकाक्षाए पूरी नदीं हो सकती । सुख रूप माने गये सारे पदार्थ क्षण-क्षण परवश हैं । स्त्रीपुरुष आदि कै सरि सम्बन्ध खयूठे हे ! शरीर का अहकार एकदम खोखला है । जिन प्राणी- पदार्था को अपना मानकर मनुष्यं भूलता है ओरं उनके लिए सारा अत्याचार करता ই, वे प्रतिक्षण केवल कष्ट देने वाले हे । | “जैसे दीपक की शिखा क्षण-क्षण बदलती है वैसे मनुष्यो का मन क्षण-क्षण बदलता है। ऐसे मनुष्यो से सुख की आशा करके उनके मोह मे बध जाना कितनी बेवकूफी है। पागल हाथी पर बैठकर कुशल चाहना तथा उन्मत्त मनुष्यो से अपने सुख-लाभ की आशा रखना दोनो नादानी दै। जो लोग विषय-सुख ओर सम्मान को ही सच कुछ माने बैठे है, ऐसे सकामी जीवो से खतरा पदा होने के सिवा ओर क्या हो सकता है । '“লানা हुआ विषयसुख दुखपूर्ण ओर छीनाञ्चपटी कौ वस्तु है इस मयकदे मे काम नहीं होशियार का' वाली कहावत है । खरगोश के सीग तथा कच्छप के पीठ पर रोम नहीं होते, वैसे ससार कौ वस्तुओ मे सुख नही है जिसके लिए प्रमादी लोग लड़ रहे हैँ । सन विषयो मे पचपच कर मरते है ओर उनकी विषय पिपासा बढती जाती हे! आपको सुनने मे यह बात असभव लगेगी कि विद्या ओर वुद्धि के बडे-बडे अहकारी भोग-सम्मान कौ मृगतृष्णा मे नाच रहे है । यद्यपि यह बन्धन अंधकार मात्र है जो विवेक-प्रकाश उदय होने पर सर्वथा समाप्त हो जाता है! मनुष्य को चाहिए कि वह महात्माओ कौ शरण मे जाकर विवेक प्राप्न करे।'! (शब्द ३) “व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को न जानकर तथा इस विकारी जगत को देखकर भटका हुआ है। इसने देह, नाम, रूप, वर्ण, आश्रम, माता, पिता, भाई, घर, धन, देश, जाति आदि कितने नाम लिये जाय अपना मान रखा है जो वस्तुतः झूठे है। शरीरादि विजाति वस्तुओ को अपनी मान-मान कर ही सारे बन्धन खडे हुए हैं। सभी चेतन अपने आप अनादि स्वरूप एक दूसरे से असग हैँ । वस्तुतः कोई किसी का नहीं है । प्रपच सम्बन्ध स्वप्रवत है |”! (शब्द ४) “इस ससार मे रहते हुए बडी सावधानी से सबसे बचा-बचा कर चलो ! पहले तो यह समञ्ञो कि इस ससार मे तत्वतः अपना कोई नही, कुछ नहीं है ! अन्य अपने माने हुए लोग तुम्दे बन्धनो मे बाध कर अलग हो जायेगे। अपने मन.कल्यित सुख के लिए सव जीव अन्यायी ह । वे दया, क्षमा, परोपकार चिलकुल भूल गये है । अपना ही मन जो रात-दिन साथ मे रहता हे, भयकर हे । जरा-सा असावधान हौ जाओ तो यह कुवासनाओ ओर कुकर्मो मे डुबा देता है। ससारी देहस्वभाव-वश विषयासक्त हैं। वे अहंता-ममता में पागल हें। वे नीति- अनीति का विचार छोडकर समता तथा सत्यता से दूर है। जो अपने तथा दूसरे के सच्चे हितकारी हैं ऐसे सनन्‍्तो की स्थिति का उनको ज्ञान नही है। न वे अपनी सच्ची हानि जानते हैं और न लाभ। वे सामने मिले हुए विषयो में लट्टू हैं और सुख के मूल स्वरूपस्थिति से दूर




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now