धर्मामृत भाग - 1 | Dharmamrit Vol 1

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Add Infomation AboutUpadhyay Muni Nirnaya Sagar
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
196
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अनन्तर क्षेमंकर तीर्थंकर से दीक्षा लेकर आयु के अंत में सहसार स्वर्ग में देव सुख का
अनुभव कर जम्बूद्वीप के छत्रपुर नगर में नन्दिवर्धन महाराजा की वीरवती महारानी से नन््द सामक
पुत्र हुआ। यहां पर भी अभिलक्षित राज्य सुख को भोग कर प्रोष्ठिल नाम के गुरु के पास दीक्षा
लेकर उग्र तपश्चरण करते हुए ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और दर्शन विशुद्धि आदि
सोलह कारण भावनाओं का चितंबन कर तीर्थंकर नमकर्म का बंध किया। आयु के अंत में सब
प्रकार की आराधनाओं को प्राप्त कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में श्रेष्ठ इन्द्र हुआ।जब इस इन्द्र की आयु 6 महीने शेष थी तब इस भरत क्षेत्र के विदेह नामक देश
सम्बन्धी कुण्डलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ के भवन के आंगन में इन्द्र की आज्ञा से कुबेर के द्वारा
की गयी प्रतिदिन साढ़े दश करोड़ या चौदह करोड़ रत्नों की मोटी धारा घशसने लगी।श्री शुभमिती आषाढ़ शुक्ला बष्ठी, शुक्रवार 17 जून ईसवी सन् से 599 वर्ष पूर्व की
रात्रि के पिछले प्रहर में सिद्धार्थ महाराज की रानी प्रियकारिणी ने सोलह स्वप्न देखे एवं प्रभात में
अपने पतिदेव से उन स्वप्नों का फल सुनकर संन्तोष प्राप्त किया। अनन्तर देवों ने आकर
भगवान का गर्भं कल्याणक उत्सव मनाते हुए माता-पिता की विधिवत् पूजा की। अर्थात् मातात्रिशला के गर्भ में अच्युतेन्द्र का जीव आ गया |जन्म कल्याणकनव मास व्यतीत होने पर चैत्र सुदी 13 सोमवार 27 मार्च ईसवी सन् से 598 वर्ष पूर्व
माँ त्रिशला ने तीर्थकर बालक को जन्म दिया । उनके जन्म से तीनों लोको में क्षण भर के लिए
शांति की लहर छा गई। उनके जन्म से सर्वत्र सुख शांति, धर्म, लक्ष्मी, यश आदि की वृद्धि हुई
थी। इसलिये उनका नाम वर्धमान रखा गया। सौधर्म इन्द्र ने मेरु पर्वत की पांडुक शिला पर
असंख्यात देव समूह के साथ उन भगवान बालक का अभिषेक किया।संजयंत व विजयंत नामक मुनिराजों का संशय उनको देखने मांत्र से दूर हो गयाथा।
अतः उन्होंने उनको ' सन््मति' कहकर सम्थोधित किया। बाल्यावस्था में ही संगम देव द्वारा ली गई
परीक्षा में बे सफल हुए। संगम देव इनकी शक्ति व निर्भयता देखकर दंग रह गया, उसने नप्नीभूत
होकर उनकी “महावीर ' नाम से स्तुति की।भगवान महावीर पांचवे बालयति तीर्थंकर थे। इनके पूर्व वासुपूज्य भगवान , मल्लिनाथ
भगवान, नेमिनाथ भगवान, पाश्वनाथ भी बाल ब्रह्मचारी तीर्थकर थे। इन्हेनि स्वेच्छा से शादी
नहीं रचायी। सकल विषय वासनाओं को जीतकर तीस वर्षं की वय में इन्होंने मंगसिर चदी 10
सोमवार 20 दिसम्बर सन् ई मवी सन् से 569 वर्षं पूर्वं मेँ दिगम्बर जिन दीक्षा ग्रहण की।बारस वर्ष की कठोरतम मौन व्रत एवं संयम साधना व आत्म ध्यान के फल स्वरूप
जुम्भिका ग्राम के समीप, ऋजुकूला नदी के किनारे मनोहर नामक वन में भगवान महावीर स्वाभी
को वैशाख सुदी 10 रविवार 26 अप्रैल ईसवी सन् से 537 वर्ष पूर्व को चार घातिया कर्मों को
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