तुलसी और उनका काव्य | Tulsi Aur Unka Kavya

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : तुलसी और उनका काव्य  - Tulsi Aur Unka Kavya
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रामनरेश त्रिपाठी - Ramnaresh Tripathi

Add Infomation AboutRamnaresh Tripathi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
तुलसी और उनका फाञ्यपातक पीन, छुदारिद दीन, मलीन धरे कथरी करवा है। लोक कहै, विधिहु न लिख्यो सपनेहू नहीं अपने वर লাই ॥ राम को किंकर सो तुलसी समु भेहि भलो कहिवो न रवा है । ऐसे को ऐसी भयो कवहू न भजे विन वानर के चरवाहै ॥ (कवितावली ) मातु-पिता जय जाय तज्यो विधिहु न लिखी कछू भाल भलाई। त्तीच निरादर भाजन कादर कूकर टूकन लागि ललाई।॥(कबितावली ) जायो कुल मंगन वघावनौ वजायौ,सुनि भयो परिताप पाप जननी जनक को । बारें ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन,जानत हौ चारि फल चारि ही चनक को ॥|(कचितावली ) जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागि बस,खाये दूक सबके विदित बात दुनी सो ।(कवितावली)छाछी को ललात-- (कवितावली) हुतो ललात कुसगात खात खरि मोद पाइ कोदौ कने । ¢ ५ (गीतावली)चाटते र्यो स्वान पातरि ज्यो कवं न पेट भरो ।(विनय-पत्रिका) जननी जनके तञ्यो जनमि करम चिनु विधिं सृज्यो श्रवडेरे,कफिरेड ललात विनु नाम उदर लगि दुखड दृखित मोटि हेरे ।(विनयपत्रिका) वाल दसाहूँ न खेल्यों खेलत सुदाउं में ।(विनय-पत्रिफा) स्वारेय के साथिन तथ्यो तिजरा को सो टोरक भ्रीचर उलटि न हेरो ।(विनय-पन्निफा)द्वार-हार दीनता कही काढ़ि रद परि पाहूं । ह दयालु दुनि दस्र दिसा दुख दोप दलन छम, कियो न्‌ संभापन काहूँ ।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now