नवीनता के अनुगामी | Naveenta Ke Anugaam

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Naveenta Ke Anugaam by शंतिचंद्र मेहता - Shantichandra Mehta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नवीनता के अनुगामी ३ दैनिक खान-पान में भी देखते हैं कि एक ही तरह का शाक रोज-रोज साधारण प्रकृति के मनुष्य को अच्छा नहीं: छूगता, रहन-सहन व वेष-भूषामे मी वे निय एक हौ दंग को पसंद नहीं करते । यह तो साधारण प्राणियों के छोकिक रुचि का प्रश्न है, किन्तु वास्तविक जाग्रत आत्मा का स्वभाव हैं कि वह नई-नई समस्याओं को सोचती है, नई-नई भावनाओं को नये २ दृष्टि- कोणों के आधार पर विचारती है, यह उसके जाग्रत होने का, गतिशील बने रहने का प्रवर प्रमाण दै । जहां जीवन में सम्यग्‌ गति नहीं है, स्थगन है, वहां वेचारिकता नहीं है, नवीनता नहीं दै तो वैसा जीवन, जीवन नदीं, उसे मृत्यु का दूसरा नाम कह सकते हैं | वास्तविक नवीनता में कुछ ऐसी ही आकर्षण शक्ति है कि अनायास ही विकासशील व्यक्ति की अन्‍्तर्‌बति उस ओर झुक जाती है । आप जानते दैः कि वर्ष के सभी दिन एकस होते हैं, किन्तु आप लोग कुछ दिनों को नये दिन कह कर मानते हैं, यह क्या है--नवीनता के प्रति छिपे आकर्षण का प्रकारान्तर प्रकटीकरण का आभास ही त्तो। इससे यह भी . स्पष्ट होता है कि मनुष्य सदेव सही नवीनता के प्रति सजग रहता दैः। । अव प्रश्न उठता है कि नवीनता के प्रतिः यह आकर्षण घृति मनुष्य के हृदय सें संल्म क्‍यों हे ? जीवन में इस धृति से पयां कोई लाभ सी है ९ ।




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