षटखंडागम - खंड 12 | The Satkhandagama - Vol 12

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The Satkhandagama - Vol 12 by श्री हीरालाल जैन - Shri Hiralal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ११ ) विषय ষ্ঠ अनुभागवन्ध स्थानान्तर योगस्थानान्‍्तरोंक्े समान नहीं हैं इसका विचार ११५ जघन्य स्थानसे द्वितीय स्थानके प्रमाणका चिचार व उनमें स्पधक प्ररूपणा १९६ आगे भी तृतीयादि स्थानोंके प्रमाणक विचार ` १२० जघन्यादि स्थानोमे षटूर्थान्‌ प्ररूपणा व स्थानोंका अल्पवहुत्व १२० काण्डकप्ररूपणा १२५ काण्डकप्ररूपणाके प्रसंगसे अनुभागवन्ध ओर अनुमागसत्कमेका भहपब्रहुष्व १२३ काण्डकशलाकाओंका प्रमाण १३२ झअनन्तभागवृद्धि आदिका प्रमाण १३३ अनन्तभागघृद्धि आदिका अल्पबहुत्त. १३३ ओजयुग्मपरूपणा १३४ षट्स्थानप्ररूपणा १३५ अनन्तभागवृद्धिविचार १३५ असंख्यातभागवृद्धिविचार्‌ १५१ संख्यातभागवृद्धि विचार १५४ संख्यातगुण्ुद्ध विचार १५५ असंख्यातगुणबृद्धि बिचार १५६ अनन्तगुणवृद्धिविचार १५७ जघन्यादि स्थार्नोमिं श्रनन्तभागवृद्धि आादिका विचार দল जधन्य स्थानमें अनन्तभागवृद्धि आदिकी प्रसाणप्ररूपणा 1९८६ प्रथम अष्टांकले लेकर ऊबंकतक प्राप्त होनेवाली अनन्तगुणबृद्धिके विपयर्म तीन अनुयोगद्वारोकीप्ररूपणा १६१ अधस्तनस्थानप्ररूपणा १६३ समयप्ररूपणा २०२ चारसमयवाले आदि अनुभागबन्धाध्यव- सानस्थानोंका प्रमाण २०२ चार समयवाले यादि सव भनुभागबन्धा- ध्यवसान स्थानोंका अर्पकहुश्व २०५ प्रसंगसे अग्रिकायिक, कायस्थिति व अनु- भागस्थानोंका अल्पचहुत्व २०८ | ছি গু वृद्धिप्ररूपणा २०६ छुट्ट वृद्धि और छट्द ह।नियोंके अवस्थानकी परतिज्ञा २०६ पाँच वृद्धि और पाँच दानियोंकरा काल २५६ , श्रनन्तगुणबृद्धि और अनन्तगुणहानिका | काल २१० | कालविषयक अल्पबहुत्व २११ । यवमध्यप्ररूपणा २१२ | पर्यवसानप्ररूपणा २१३ : अल्पयहुत्वप्ररूपणा २१४ | अनम्तरोपनिधाकी अपेक्षा अल्पबहुत्व- | बिचार २१४ परम्परोपनिधाकी अपेक्षा अल्पबहुत्व विचार २१७ अनुभागसत्कमेस्थानविचार २१६ अनुभागवन्धस्थानसे अनुभागसत्कम मे क्या अन्तर है इसका विचार २१६ घातस्थानोंकी प्ररूपणा २२० दो प्रकारके घातपरिणामोंका बिचार २२० सक्त्वस्थान कहाँ होते हैं इसका विचार २२१ प्रथमादि परिपाटी कमपे हइतसमुश्पत्ति- स्थानोंका विचार २२६ हतद्दतसमुत्पत्तिस्थानबिचार २३२ स्थितिस्थानोंमें अपुनरुक्त स्थानोंका विचार ` २३४ बन्धसमुत्पक्ति आदि स्थानोंका अर्प- बहुत्व २४० तीसरी चूलिका २४१-२७४ जीव समुदादहारम आठ अनुयोगद्वार २४१ | जीवसमुदाहार ओर श्राठ ्रतुयोगद्रारोकी | साथेकता २४१ | एकस्थान जीवप्रमामानुगप्रचिचार २४२ निरन्तरस्थान जीवध्रमाणालुगमविचार २४४ । सान्तरस्थान जीवेप्रमाणानुगम २४५ | नानाजोवकालप्रसाणानुगम २५५ | चृद्धिमरूपणा और उसके दो अनुयोगद्वार २४६




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