कार्तिक पूर्णिमा माहात्म्य | Kartik Purnima Mahatmya

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Kartik Purnima Mahatmya by नरेन्द्रसिंह जैन - Narendrasingh Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कार्तिक पूर्णिमा ११४ ০৩০১০ ১ घन्द्रमा अम्ृतमय होने पर मी उस वह (कपर) प्रसन्न नही होवा । जो क्ररपुर्प राज्यादिके रिप क्रोधसे अपने भन्पुओं री हत्या कते है युद्धम उन्दं मासते ष्टः चे पुरुष अत्यंत छोहुपताफै बश्चीभूत द्दोकर अगने ही शरीरके अवयशोंकों काटकर स्वयं ही मक्षण करते हैं। है राजन्‌ ! लोभरूपी पिशाचके आधीन होकर तुमने” अपनी ही दूसरी भ्रुज्नारूप बन्धुके साथ युद्ध करनेक्रा यह फार्य फैसे आरम्म किया ई ! हे राजन ! हरा भयंकर युद्ध कर्मसे अब विराम लो । सब सेनिक सुखसे रहें. और दिग्गम धरणीघर शेपनागके साथ विश्रान्ति पार्त। जब तुम धर्म और भ्री युगादि प्रभ्रुक्ली आराधना करते हो सो उनके द्वारा दूर की हुई द्विसाकों फिर किस्त लिये संचित करना चावे दो ! सुपस्णु तापसरके भुखसे इष प्रकार उपदेश्च सुनने ये जिनके अन्तःकरण की स्थिति धमते मेद पाकर समान- भावको भ्राप्त हुई है, ऐसे वे द्राविड़ राजा दयाद्रं हृदयसे सोठे--: “हे घने ) श्री मरत, आदियशा और बाहुबली आदि श्री आदीक्षरके द्वी पुत्र थे; किन्तु फिर भी: उन्दोनि सहज कारणको छेकर परस्पर, युद्ध. किया था, और उन्होंने हाथी, घोड़े, मनुष्प आदिका युद्धमें विनाश. क्रिया शा व्यौ श्रेय ते तत्तत फो সী হিল)




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