परिन्दे | Parinde

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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से नदी बँध पाया है, जो वर्षों से टूटी पतग सा शूय में डगमगाता सा रह गया है--न कटी थिरता है, न कह पकड़ मे श्राता है लगता है, जेंत ग्रभी पीछे मुडे गा, तो कमरे के किसी भ्रबेरे कोने मे उसी दाम की तरह बिट्टो मेरी चीजें उलट पलट कर, इधर-उधर घिउरते हुए हसकर कहेगी “कोई काम की चीज नहीं--सब श्रह्लम- गहलम जमा कर रखा है--सद कवाडी को दे डालो ।” मैंने उठ प्रभावित करने के लिए ताश के पत्ता का जादू दिखलाया । वह मेरी ट्रिक न पकड़ सकी भौर धोखा खा गयी 1. इसमे कौन दडा तीर भार लिया, यह ता बच्चो की बातें है जी. ” मैं हृतप्रतिभ सा हो गया । मु उनका यह स्वय भ्रपने ऊपर लादा गया बडप्पन बिल्कुल भरुचिकर सा लगा । कितु बुरा दायद कभी नहीं मना पाया । उनके व्यवहार में जो कपर था, चह न बुरा था, न भच्छा. वहते पानी की तरह एक विनारि से भराठां था, द्रसरे किनारे बहू जाता था 1 बहू कमर में मेरी चोजो की खोज निरतर करती जा रही थी ! जो भी वर्समु--चाहे वह पुस्तक हो या कोई रिकाड--वह दिलचस्पी से देखती । मैं भी उसे ऐसी उत्सुकता से देखता जैसे वह चीज मेरी न हो, जैते बिट्टा की शाँपों से मैं भी उसे पहली दफा देख रहा हू । मेज की देराज से जब बढ़े एक छोटी सो नोटबुक निकालने लगी, तो मैंने सबपका कर उनका हाथ पत्रड लिया । उठते भ्पमा हाथ मरे हाथ के नीचे शिथिल सा ढीला छोड दिया आौर श्रपनी प्रश्नसुचक आाखें मुझ पर गडा दीं । इवे मत देखो, चही पड़ी रहन दी ।” “कया, कया है इसमें 7?” “मेरी डायरी है--विल्कुल प्राइवेट है, कोई इसे नहीं देख सकता ।” “श्रच्ठा, क्या मैं भी नहीं ?” दूसरे की डायरी पढने से पाप चढता है ।” ”ध्च्ठा ?*” श्ौर उनकी डरी- सहमी सी श्राखां म एक असीम विस्मय सा भाव छलकने लगा । बहू बन रही हैं, इसलिए मैं गुम्ते मे चुप बंठा रहा । डायरी का खेल / १७




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