जैन सौरभ | Jain Sourabh
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
216
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)किनने विनोत ?
वावन गजा थे बावन गजा ही, रह्या हेस पोशाल।
अक्षर बिन मायो बांध्यां ही, हेम संघाते चाल॥
कहा. गया--
न.हंस के सीखे हैं, न रो के सीखे हैं।
जो-कुछ भी सीखा है, किसी के हो के सीख हैं॥
व॒स्तुतः विनेय-भाव पूर्ण समपर्ण से ही निखरा करता है।
इसलिए सुविनीत शिष्य गुरु के हर इंगित ( काय चेष्टा ) को
समभने वाला हुआ करता है। दीक्षित- होने के बाद मुनि श्री
जीतमल নর हेमराजजी की “हेम पोशाल” में रहकर अध्य-
यन करने টা में 'हेम पोशाल? के सन्त बहुत बड़े प्रतिभा
सम्पन्न, सुविनीत व संघ प्रभावक. हुए। हेम पोशाल के
सुनि श्वी स्वरूपचन्दजी, मुनि श्री कमेचन्दजी, सुनि श्री सततीदासजी
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