सरल रेडियो विज्ञान | Saral Radio Vigyan

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Saral Radio Vigyan by आर. सी. विजय - R. C. Vijay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रेषक तथा ग्राहक का सिद्धान्त | ৬ राता है तो उसमे ठीक वैसी ही लहरें उत्पन्न होती हैं जैसी कि प्रेषक (कडा) द्वारा भेजी गई थीं। परन्तु इस प्रकार से उत्पन्न लहरों की रावित इतनी कम होती है कि सुनने से पूर्वं इनका वधेन (810]011068४10) करना श्रावद्यक होताहै । साथहीएकदही समय पर श्रनेकों स्टेशन परिप्रेषण (0109068.8६) करते हँ । किस) भी एक स्थान से प्रसारित समाचार को सून सकने के लिए यह आवश्यक है कि एक समय में केवल एक ही स्टेशन की आवाज़ जिसे हम सुनना चाहते हैं, सुनाई दे । अ्रतः ग्राहक (रिसीवर) में यह गुण होना ्रावश्यक ह कि वह वांछित स्टेशन को श्रवांछित स्टेशनों से श्रलग कर सके । ग्राहक (रिसीवर) का यह गुण जिसके द्वारा वह वांछित स्टेशन को श्रवांछित स्टेशनों से अलग करता है उसकी चुनने की रावित (8€] 60111) कहलाती है । । प्रेषक से ध्वनि तथा रेडियो की लहरें मिलाकर भेजी जाती हैं तथा ग्राहक (रिसीवर) पर यह्‌ मिली हुई ही प्राप्त होती हैं । श्रतः किसी ग्राहक (रिसीवर) द्वारा वर्षित तथा छाँटी हुई लहरें ध्वनि और रेडियो की लहरों का मिश्रण होती हैं । यह लहरें उस समय तक नहीं सुनी जा सकतीं जबः-तक कि ध्वनि की लहरें रेडियो की एरियल पर प्राप्त लर छांटी हुई रेडियो लहरें वधित तथा छांटी हुई लहरे . ध्वनि कौ कहें চন, चित्र 6. ग्राहक (रेडियो) का ब्लाक चित्र. लहरों से अलग न की जायें । श्रलग करने का यह कार्य रेडियो के जिस भाग (80886) द्वारा किया जाता है उसे डिदटैकंटर (0१९6५६01) कहते हैँ तथा यह्‌ क्रिया डिटैक्शन . ((616०0107 ) कहलाती है । डिटेक्टर पर प्राप्त संदेश विद्यत-लंहरों के रूप में होते




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