वेदव्याख्या-ग्रन्थ | Vedvyakhya-Granth

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Vedvyakhya-Granth by स्वामी विद्यानन्द - Swami Vidhanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[७] सभी धामिक ग्रन्थों को वैदिक व्याल्या बहुत सीमा तक सफलतापूर्वक की जा सकती है । [=] सभी भाषाग्रों में वेदों का प्रवेद सरलतया हौ सकता है 1 [২] सव विज्ञानो का मरूलसोत वेदो मे से खोजा जा सक्ता है । १८. अपनी उपयुक्त मान्यताओं के प्रकाश में, मैंने श्रावणी, १९९३ वि० से ऋग्वेद का हिन्दी-अनुवाद प्रारम्भ किया । मुझे सत्तोष है कि चारों वेदों का संगतियुक्त भाषानुवाद मैं अपनी मान्यताओं के अनुरूप करने में सफल होगया हूँ। १९. मेरा यह प्रयास केवल जनसाधारण के लिए है, यद्यपि विद्वानों को भी इससे प्रकाश मिलेगा । मेरा लक्ष्य सरल और सुवोध रीति से वेदों की दिव्य शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाना है । _२०. चारों वेदों के मेरे हिन्दी-वेदव्याल्याग्रत्थों के पूर्णतया प्रकाशित होने पद वेदप्रधार में एक कल्पनातीत क्रान्ति होगी ) मुझे विश्वास है कि मेरे व्याख्या-प्रन्थों के विश्व की समस्त भाषाओं में अनुवाद होंगे और परिणामस्वरूप संसार वैदिक विचार, वैदिक आचार और वेदिक संस्कृति को स्वीकार करेगा । उससे एक सावेभौम वैदिक साम्राज्य [कुठुम्ब] की स्थापना होगी, मतभेद समाप्त होंगे, विश्व में एक विशुद्ध मानव-धर्म की प्रस्थापनां होगी, एक दिव्य युग का आविर्भाव होगा । २१. यह कार्य मेरा व्यवसाय भहीं है, मेरे जीवत की एक प्रभ्ु-प्रेरित दिव्य साध है। मैंने इसमें अपना जीवन, योौवत और सर्वस्व होमा है । इसी के छिये में संसार और सांसारिकता से सदा ऊपर उठा रहा हूं । इसी के लिए में जिया हूं, इसी के लिये में जीरहा हूँ | इसी के लिये में जीऊंगा । --विद्यानन्दं विदेह्‌ १४




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