छत्रपति शिवाजी | Chhatrapati Shivaji

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Chhatrapati Shivaji by काशीनाथ गोविन्द जोगलेकर - Kashinath Govind Joglekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्वराज्य का श्रीगणेश अर पिता पर संकट बीजापुर श्रौर बंगलौर से लौटने के वाद शिवाजी ने श्रपना स्वप्त साकार करने के लिए प्रयास झारम्भ किया । उस समय वे कुल सच्ह-अ्रठारह वर्ष के थे । आ्रासपास के प्रदेश की उनकी जानकारी पुरी थी । किस जगह सुलतान की कितनी सेना है यह वे जानते थे । सभी प्रमुख देशमुख उनके समथंक वन गए थे । साथियों का दल आर छोटी-सी सेना तैयार थी । समर्थगुरु रामदास, सन्त तुकाराम आ्रादि सन्तों ने इसके पहिले ही लोगों के मन में अन्याय का प्रतिकार करने की भावना जागृत की हुई थी । शिवाजी और उनके साथियों ने इस प्रेरणा की चिनगारी को ज्वाला का रूप दिया । छीघ्र ही जनता की मनोभावना में परिवर्तन हुआ । बड़े-बड़े सरदार झब भी गुलामी में ही श्रपने को धन्य समभकते थे पर साधारण जर्नता में कुछ करने की इच्छा सदियों के बाद जायुत हुई । पुना के श्रासपास का प्रदेश अरब शिवाजी के हाथ में था । इसके बाद उन्होंने किलों की आ्रोर हाथ बढ़ाना श्रारम्भ किया । महाराष्ट्र में बहुत से किले हैं श्रौर उस समय के लड़ाई के तरीकों में किलों का बड़ा महत्व था । उस समय तोपें छोटी होती थीं और दास्त्रास्त्र भी पुराने ढंग के ही थे । जिसके पास किले हों वह आसपास के प्रदेश पर शासन कर सकता था । कहा जाता हैं कि शिवाजी ने सबसे पहिले तोरणा किले पर कब्जा किया । इसकी मरम्मत कराते समय उन्हें बहुत सा गड़ा हुद्ना धन मिला । इन धन से उन्होंने तोरणा के पास के एक पहाड़ पर नया दुर्ग बनवाकर उसे नाम दिया राजगढ़ । काफी समय तक राजगढ़ पर ही उनकी राजधानी थी । कुछ लेखकों का मत है कि शिवाजी ने सबसे पहिले तोरणा नहीं पुना के निकट का दुर्ग कोंडाणा, जिसे अरब सिंहगढ़ कहते हैं, लिया । उनके गुरू दादा जी बीजापुर के सुलतान की श्रोर से इस किले के सूबेदार थे । जब उनकी सृत्यु हुई तो शिवाजी ने बीजापुर से नया सूवेदार श्राने के पह्ठिले ही इस किले पर कब्जा कर लिया । दादाजी की मृत्यु शिवाजी के लिए एक बड़ा श्राघात था । उनका मार्गदशंक श्रौर गुरू उनके जीवन कार्य के श्रारम्भ में ही विछुड़ गया । पर छोक करने के लिए समय नथा। वे जानते थे कि गुरू के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजली उनके बताए हुए मागं पर चलकर स्वराज्य की स्थापना है । झ वीजापुर के सुलतान ने पहिले शिवाजी के प्रयास को लड़कों का खेल समभझ कर उस श्रोर कोई ध्यान न दिया । पर जब उसे पता चला कि शिवाजी ने तोरणा, कोंडाणा, रोहिड़ा भ्रौर पुरन्दर जैसे किलों पर कब्जा कर लिया है श्रौर राजगढ़ का नया दुर्ग वनवाया हैं तव वह चुप न रह सका : इस प्रदेश के रहने वालों ने श्रव लगान थी सुलतान के खजाने में नहीं शिवाजी के खजाने में देना शुरू किया । भारम्भ में शिवाजी का कार्य गुप्त रीति से और सुलतान के प्रतिनिधि के रूप में हो रहा था, पर शीघ्र ही उसका वास्तविकस्वरूप प्रकट हो गया ।




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