श्रावकाचार संग्रह | Shraavkachar Sangrah

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१८ श्रावकाचार-संग्रहसागार और अत्तगार धर्मका निर्देशउपवृंहण अंगका वर्णनस्थितिकरण अंगका स्वरूपवात्सल्य अंगका वर्णनप्रभावना अंगका वर्णनश्रावकव्रततोके धारण करने योग्य पुरुपका निरूपणयद्यपि सम्यवत्वी पुरुषका ब्रत-ग्रहण मोक्षके लिए होता है, तथापि सम्यवत्वी, मिथ्यात्वी, भव्य और अभव्यको भी ब्रत्त धारण करनेका उपदेशपुण्य क्रियाओंके करनेका उपदेशभणुब्रत्त और महाब्रतका स्वरूपहिसा पापका निरूपणएकेन्द्रियादि जीवोंका विस्तृत विवेचनप्रमत्तयोगी सदा हिसक है, अप्रमत्तयोगी नहींअणुक्नतधा रीको चर्साहसावाली क्रियाओंका त्याग आवश्यक हैब्रतके यम और नियम रूप भेदोंका वर्णनमहारम्भ रूप कृषि, वाणिज्य भादि कायंकि त्यागका उपदेब्रतरक्षार्थ भावनाओंके करनेका उपदेशश्रावककी यथासम्भव ईर्या आदि समित्तियोंके पालन करनेका उपदेशभोजनके समय श्रावकको हिंसा पापकी निवृत्तिके लिए यथासम्भव अन्तरायोंके पालन करनेका तथा द्विदल अन्न आदि खानेका निर्षेघएपणाशुद्धिके लिए सृतक-पातक आदि पालनकां निर्देशसदहिसाणुक्रतके अत्तिचारोका निरूपणसत्याणुव्रतका निरूपणसत्यत्रतकी भावनार्गोका निरूपणसल्याणुव्र्तके मत्तिचारोका निरूपणअचौर्याणुन्नतके स्वरूपका वर्णनअचौर्याणुत्रतकी भावनाओंका निरूपणंसचौर्याणुत्रतके जतिचारोका निरूपणबरह्मचर्याणुव्रतका निरूपणब्रह्प्वर्याणुत्रतकौ भावनारगोका वर्णनब्रह्म वर्याणुव्रतके अत्तिचारपरिग्रहुपरिमाण जणुब्रतका स्वरूपपरिग्रहपरिमाण त्रतकी भावनाभोका निरूपणपरिग्रहपरिमाण ब्रतके अत्तिचारोका वर्णनदिग्विरति गुण ब्रतका वर्णनदिग्विरति गुणब्रतके अत्तिचार७१ ७४ 41७६7)७८८१ ८३ ८४१ ८५ ९१ ९६1) ९८१००१०२१०६ १०७ १०८ ११० १११ १६२ ११४ ११५ ११६ ११७ ११९ १२० १२१ १२२ १२३ १२४




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