जीव कर्म - संवाद | Jeevkarm-sanvad

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Jeevkarm-sanvad by श्री आत्माराम जी - Sri Aatmaram Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(৬) सन्देह-रहित नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे লিন্বার্-সফল विषय के वास्तविक स्वरूप को समभ लेने को तुम लोगों को बहुत आवश्यकता है। एतद्थ ही मेन तुम्हार लिप इस विषय को चुना हैं । कितन एक विचारक इस जीवात्मा को कर्मा से सर्वथा श्रसयुक्घः कतैन्व भोक्षत्वादि धर्मा से रहित सर्वथा अपरिणामी कूटस्थ रूप मानते हैं। और कई एक सम्प्रदाय इन कर्मों को ही सर्वे प्रधान खीकार करते हैं। तथा किसी के मत में जीव और कर्मा से सर्वथा प्रथरू एक नियति-होनहार को ही प्रधान स्थान दिया गया है। एचं किसी २ ने जीव और कर्मों के सेयोग तथा वियोग के लिए म्वतन्त्र व्यक्ति के रूप में एक इंश्वर तत्व को ही লনা বল বক্ষ है | अब इन उक्क विचारों में जो तथ्य हैं उसी को में तुमांर सामने उपस्थित करता हूँ । उसको समभ लेने पर जीव और कर्म के विपय में तुम लोग निःसन्दह हो जाओगे। भगवान्‌ के इस मधुर भाषण को खुन कर श्रमण-लमुदाय को बडा हर्ष हुआ, वह मन ही मन मे अपन को बड़ा ही पुएयशाली खमभने लगा ओर भगवान के जीवकर्मविपयक उपदेशास्तत को पान करने की बड़ी आतुरता स प्रतीक्षा करने लगा। मगवान्‌ के इतना कह चुकने के बाद तत्काल ही उन श्रमरणों न वहां पर नो पुरुषों को हाथ जोड़े भगवान के सामने खड़े हुए. देखा। उनको देखते दी वे बड़े विस्मित हुए । उनमें आहठों का स्वरूप और




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