खड़ीबोली का लोक-साहित्य | Khadhi Boli Ka Lok Sahitya

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
53 MB
कुल पष्ठ :
509
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( जौ )
३. सूरज भवारा--कन्या नित्य नहाकर एक खोटा जर सूरज को चढाती है ।
४. दातन कन्था--चार बजे (ब्राह्यमुहृतं मे) उठ कर दातन करके तब
बोलती है और ऐसा ही साल भर नियमत হী ই
५. कौड़ी गहला--एक छोटा सा घर ( चॉदी का ) बनाकर और एक
पुतली चाँदी की बनाकर ससुराल भेजी जाती है । कन्या प्रतिदिन एक कौडी
या पैसा डालती थी और साल के बाद वह ससुराल को भेज दिया जाता था ।
६. चिडिया चुगाई --कुछ दूर मे धरती लीप कर उस पर बाजरा
बखेर कर चिडिया चुगाई जाती है ओर नन्द के छितर वर्षान्तं मे इजार ओच्ी
चिडिया चृगाने की निशानी मेजी जाती है ।
७. फूफस के थुआ देना--निम्न पद्म कह कर बहू फूफस को गुड की
भेली देती है---
ससुरे बहन बलस कौ कुजा ।
मेरे रेखे भट्टी कौ थआ ॥
८. सास की रंसाई--कडी बात कट् कर सासू को रुष्ट करना ।
९. सास् निमाई--सास् को जिमाकर प्रसन्न करना ।
१०. ससुर जिमाईइं --ससुर के कन्धे पर दुशाका डाक कर मेवा भर देते
है और दो चार रुपये डाल देते है---
ससुर मेरा वाखा भोला ।
भर मेवा का ज्ञोला।
११ ससुर को पिन्नी देना--'दमकन पिन्नी चमकन सुसरा' यह् कहां
जाता है ।
१२ केले पिया मिसरी, मेरे मनते कभी न बिसरी ।
१३ जेठ जिठानो का बहा--
आयत यायत धरी मिठाई ।
जेठ जिठानी হি मिल खाई ।
१४ भगन का बहा--
चार कचोडी ऊप्पर जीरा ।
कदी ना बन् मोरो का कीरा ॥
१५ जेठ का बेटा--
चार कचोरी ऊपर दही ।
जेठ के बेटे ने चाची कटी ॥
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