अकेले कंठ की पुकार | Akele Kanth Ki Pukaar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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च्छद द ९, = & आया সপ षु च कु द द्ध ऋ ब द ७ ४ $ १५ ৯ रास्ते में मिल गए जो, शुष्क मन की रेत पर ही खिल गए जो, साँस के पथ से समाए प्राण में जो, स्वर बने- औ' हो गए इस ज़िदगी के त्राण-से जो- वही मनचाहे, सजीले राग उठते जाग : प्रात: के पवन में सुन खगो के बोल, या फिर सूँघकर खुशब गुलाबों की बड़ी अनमोल । चाँद-तारों की बिदा के आँसुओं की सजल বলা... नील नभ पर सिर्फ़ हे सूरज अकेला और घरती पर अगिनती मनुज अलसाए, उनींदे, ऊंघते, सोते, बदलते करवटें, या उठे, बेठे, टहलते -ज्यों नींद के बादल फटें, या कर रहे होते प्रतीक्षा सामने के पम्प से भरकर घड़े लड़के हटे । उस तरफ़ के किसी धर से धुंआ उठता . . . चीखते बच्चे, सुठछगती लकड़ियाँ, बरतन खड़कते । मिलों के भोंपू चिघरते । खलबली मचती छतों-खपरल-छप्पर के तले । रेख, मोटर, टाम, इक्के बाँधकर ताँता चले । जागते सब . . . जागता बह मन कि जो मोहित हुआ-सा उन्नीस




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