कर्त्तव्य-कौमुदी | Kartavya Koumudi

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Kartavya Koumudi by पत्रालाल जी - Patralal Ji

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about पत्रालाल जी - Patralal Ji

Add Infomation AboutPatralal Ji

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
सतक्ञाचस्ण॒म ७ सम्पूर्ण जगन्‌ में समान साथ का अनुमव करना, योग की साभना पर इसी तरद परम थोगी पद की प्राप्ति करना, चतुर्थ अवस्था फे मुख्य कत्तेत्य है । तीमरी अवस्धा में अंशतः फत्तेब्य पालन कर धीरधोरे 'घागे कूच करना चाहिए अर्थात्‌ स्थूल पापो का আহ फरना याहिये জিলল কাম अद्रते-यदते विपय, फपाय का सर्वथा स्याग किया जा सऊ। देश और समाज कौ सेवा फरना चाहिये जिनसे दृ की विशालता बढ़े, और इस तरह से समग्र जगत शिवा दिश्य के ऊपर कुहुस्थ भाव जागृत টা] प्रथफ पथफ प्रन निद्रम हृत्यादि प्रडण करना चाहिये जिममे शआ्रागे बढ़ने हुए संवभादि भारण करके योग्य साधना फे मार्ग पर सग्लता से चल सके । तीसरी 'प्रोर चतुथ अवत्या का यह तारतम्य है और यही इस अन्ध के दोनों सरहों फा उपक्रम तथा उपसंदार है ॥ ३॥




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now