तीसरा कर्मग्रन्थ | Teesra Kramgranth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ९ | सकता है ओर न ढुःख से । इसी कारण पहले कमंग्रन्थ में कंस के खरुप का तथा उस के भ्ंकारों का बुद्धिगम्य वणन . किया है । कम के खरुप ओर भकारों को जानने के बाद यह श्रश्न होता है कि क्‍या कदाम्रहि-सत्यामही, अजितेन्द्रिय-जितेन्द्रिय, अशान्त-शान्त और चपल-स्थिर सब प्रकार ऊ जीव अपने अपने मानस-क्ेत्र में केस के बीज को बराबर परिसाण में ही संग्रह करते और उनके फल को चखते रहते हैं या न्यूनाधिक परिमाण मे १ इस प्रश्न का उत्तर दूखरे कमप्रन्थ मं दिया गया ह । गणस्थान के अनुसार प्राणीवर्गं के चौदह विभाग कर के प्रत्येक विभाग की कर्म-विषयक्त वन्ध-उद्य-उदीरण-सत्ा- सम्बन्धिनी योग्यता का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार अ्रत्येक गुशस्थानवाले अनेक शरीरधारियों की कर्म-बन्ध आदि सम्बन्धिनी योग्यता दूसरे कमग्रन्थ के द्वारा माछूम की जाती है इसी प्रकार एक शरीरधारी की कर्म॑-बन्ध-आदि-सम्बन्धिनी योग्यता, जो मिन्न भिन्न समय में आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा अपकषं के अयुसार बदलती रहती है उस का ज्ञान भी उसके द्वारा किया जा सकता है। अतएव प्रत्येक विचार-शील प्राणी अपने या अन्य के आध्यात्मिक विकासि के परिमाण का ` ज्ञान करके यह जान सकता है कि झुझ में या अन्य में किस किस प्रकार के तथा कितने कर्म के बन्ध, उदय, उदीरणा और सत्ता “की योग्यता है । उक्त प्रकार का ज्ञान हीने के बाद फिर यह प्रश्न होता है कि क्‍या समान शुणस्थान बाले भिन्न सिन्न रति के जीव




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