घृणामयी | Garna-vani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२१ घणामयी । संबंध केवछ गुरु-शिष्यका था। अब मुझे उनके साथ मित्रताका संबंध स्थापित होनेकी आशा हुई। डाक्टर साहबको में पहले बिलकुछ नहीं जानती थी । इन दोनो मित्रेकि शुमागमनसे मेरे जीवनका इतिहास विशेष रूपसे संबंधित है। इसलिये इसी विषयकी चर्चा में मुख्य रूपसे फगी। बहुत सभव है, इस अभागिनीकी कहानीकों पढनेवाली कुछ ऐसी पाठिका भी होगी जो पतिकी पूजामे, वाक-वरचेकि पाठनेमे, अतिथि- भभ्यागतोकी सेवामे, समस्त संसारंके मंगलार्थ तीज और मंगलके पुण्य प्रत रखनेमें, कल्याणीया देवौकी तरह घर-गिरस्तीके काम-काजमें रत रहकर बड़ी कठिनाईसे फाछतू कितावोंके पढनेके लिये समय निकाछती होंगी। इन सब देवियोंको मगल-कर्मोसे अनभिक्ल इस पापिनीकी बातें बिल्कुल अनोखी और अचरज-भरी जान पड़ेंगी। में जानती हूँ कि मेरी कथा संसारसे निराली है। भे पुप्यमय गारहस्य जीवनसे अनभिज्ञ हैं। पर फिर भी सभी नारियोंकी तरह मेरी नसोंमें भी तो प्राणकी वही एक ही धारा वह रही है! हे मेरी प्यारी माताओं और बहनो! इस अधम नारीके हदयमे चाहे कितनी ही ध्रणा भरी हो, पर मे प्रार्थना फरती हूँ, तुम अपनी पवित्र आत्मार्मोको घृणासे मलिन न करके मेरी दू ख-भरी पाप-पूर्ण बातोंकि उपर अपनी सुकुमार करुणा और सहृदयताका अमृत बरसा হী! ८ নাজ कहैयालाल और प्रोफेसर किमोरीमोहनमे गादी मित्रता थी। दोनों फुर्तालि, वोलनेमें तेज, चार्ते चनानेमे कुशल और समा- चतुर्‌ भे} तुच्छते-तुच्छ घटनापर भी ये मित्रदय अपने रचना-कौशछसे




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