वातव्याधि चिकित्सा | Vat Vyadhi Chikitsa
श्रेणी : स्वास्थ्य / Health

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutVaidya Shri Gopinath
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
34.63 MB
कुल पष्ठ :
370
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about वैद्य श्री गोपीनाथ - Vaidya Shri Gopinath
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)हा
लदि जासिर ट्ररटा रस न पिटपियदेर मन पम्प
प्राण जीव के साथ रहता है और जब आत्मा मुक्त हो
जाता है तब उसका प्राण प्राण में मिल जाता है-इसका
वर्णन वेद में है ।' वेद में श्वास निःध्वास कीं प्रक्रिया का
वर्णन वड़े ही सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है । जिसमें.
वायु से घ्राथना की गई है कि “वायु ! तू रक्त में जो
सल है उसे दाहर निकाल क्योंकि तू सब. रोगों वग भेषज
है, तू देवों का दूत होकर विचरता है”-ा
द्वाचिमौ वातौ वात सा सिंन्धोरा परावत: ।
दक्ष ते अन्य भा वायु परान्त्यों वातु यद्रप: ॥।
हा वात वाहि भेपजं बविवात वाहि यद्ू रप: ।
रवं हि निषा भेषजणों देवानां दत ईयसे 1
“ऋग्वेद १८1१३७।२-३, अथवें. ४. ९५९३.२-३
चिनाशशील पिंड में 'जीवात्मा आयुप्सान होकर कैसे
ध्वस्थ रह सकता है इस चिन्तन धारा से ही पघभु ने मायु-
4द.की रचना सी । आयुर्वेद का माधार चिदोष सिद्धान्त है
जिसका वर्णन वेदों में उपलब्ध होता/ है । ऋग्वेद १1३४1
६ सें “'सूनवे न्िघातु कस चहल शुभरपती” के भाप्य में
सायणाचार्य लिखते हैं-“'हे शुभस्पती हे शोभनस्य जगत:
पालकौ भध्विनीकुमा री युवां. निधालुप्रणमनं वातपित्त बले-
प्मशा म् प्रशमनें शर्म सुखेन सम्यक् वहतम कुरुयमू 117”
इसीं प्रकार क्ग्वेद १!८५1१९४ में वर्णित “लिधघातुचि” की
भ्याख्यग दयानन्द सरस्वतीं ने भी इसी प्रकार से की है-
''विघातुनि, चयोवातपित्तकफा: येपु शरीरेषु तानि
शरीराणि”” । रदन/इसनयय्ट्ण
दर हा अप दास: > ्नडवपपय ापरागडयुण
रत धन्य हे रीएम है जिन पइय जग रण टच धथ शा शधाास्णटअतकाापवब्यखम्ययन (नव 1रत टेनस्लण इतना न
स्ज्ण् 1. जन तपया दादहबजमा डे पनीससजपज रमध का रफिस्नीकन्टट्णड वअना किमर्हाषि 'सुश्रुतत के वायु: पालयति प्रजा:” का इस मन्त्रमें वर्णन किंया गया है-- «
ओइमू ण्तघारं चायुमर्क स्वधिदं छृचक्षसस्ते अभि-
चक्षसे रयिम् । ये पृणन्ति प्र
दक्षिणां सप्त मातरमू 1 -मथवें १८1४२
दीघे 'जीवन के .लिए मशूतमय भौपषध भंडार से मश
घाप्ति की प्ाधना वायु से. ही की गई है , क्योंकि दायु ही
“'विश्वभ्रेषज”” किया ' दिनदूत”” के नाम से न्यवह्त किया
गया है.
यददो बात ने... गृंहेप्मृतस्यनिधिहितः । .'
ततो नो देह. जीवसे ।।. --अग्वेद १०1१८६।३यच्छस्ति सवंदा, ते' दुद्धते -ऋतुसंन्घियों यें व्यापकरूप से फैलने वाली महामा-रियों को रोकने के लिए “'मंपज्य यज्ञ” किये जाते थेजिनका वर्णन वेदों में उपलब्ध होता है । इनसे वातावरण _सुरशिगन्धमय बनने से रोग दूर हो 1 भ्रयवान चरक
से भी इस कार्ये को. वेदविह्नित कहा है तथा इस ओर
इंगित कर वायु की महत्ता प्रदर्शित की है--य या प्रयुक्तता चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुराजित: 1.तां वेदविद्दितािमिष्टिमू मारोग्यार्थी प्रयोजयेद् 1।' 'ही_ “नवद्य गोपीनाथ पारीक “गोॉपेश' शिव ०.चिशेष सम्पादक-''वातब्याघि चिकित्सा” ''पो० पचार (सीकर) राज ०ज वेदों में वायु वर्णन-चरक चिं० र।परघ्ट *.-
User Reviews
No Reviews | Add Yours...