भारत में पंचायती राज परिप्रेश्य और अनुभव | Bhaarat Mein Panchayati Raj Paripreshy Aur Anubhav

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Bhaarat Mein Panchayati Raj Paripreshy Aur Anubhav by जॉर्ज मैथ्यू - George Methew
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
9 MB
कुल पृष्ठ :
238
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपना ध्यान कंट्रित किया था। अतः प्रारम्भ मे प्रमुख नगरो में नामित सदस्यावाल स्थानीय निकायों का गठन ही उनका मुख्य उद्देश्य था । इसी क॑ तहत 1687 में मद्रास में एक नगर निगम स्थापित किया गया । टाउन काउसिल के ब्रिटिश मॉडल पर बनाये गये इस निकाय को गिल्ड हॉल तथा विधालय निर्माण पर कर लगाने का अधिकार दिया गया । समय बीतने के साथ-साथ इस निकाय तथा अन्य प्रमुख नगरी मे गठित इसी प्रकार के निकायों के कार्य केलाप का विस्तार हुआ तथा उनके कराधान अधिकारों में वृद्धि की गयी । यधपि ये निकाय स्थानीय सरकारों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति करते थे, किंतु इनका सचालन निर्वाचित सदस्यों के वजाय नामाकित सदस्य ही करते रहे। मेयो प्रस्ताव : 1870 मे लॉर्ड मेयो न अधिकारों के विकेन्द्रीकरण के लिए अपनी परिषद द्वारा एक प्रस्ताव करवाया, ताकि जनता की माॉँगिं पूरी करने की प्रक्रिया में प्रशासनिक कुशलता लायी जा सके और “देश की बढ़ती मॉगों को पूरा करने में अपर्याप्त इपीरियल ससाधनों में वित्तीय वृद्धि' की जा सके । जैसा कि वायसराय काउसिल के वित्त सदस्य सैमुअल लैग ने कहा था, 1857 के विद्रोह के कारण इपीरियल वित्तीय व्यवस्था पर भरपूर दबाव पड़ा तथा यह जरूरी समझा गया कि स्थानीय कराधान से ही स्थानीय सेवाओ की वित्त व्यवस्था की जाये। अत वित्तीय मजबूरी के कारण स्थानीय सरकार सबधी लॉर्ड मेयो का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। फिर भी इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के नीति विकास में यह एक ऐतिहासिक कदम था। इस प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए वंगाल चौकीदारी अधिनियम के जरिये 1870 में बंगाल में परपरागत ग्राम पंचायत प्रणाली को पुनर्जीवित्त किया गया। इस अधिनियम ने जिला मजिस्ट्रेट को गाँवों में नामांकित सदस्योंवाली ग्राम पचायते गठित करने का अधिकार प्रदान किया । नामाकित सदस्योवाली ये पंचायत कर लगा सकती थीं, ताकि वे अपने द्वारा निसुक्त चौकीदारो को वेतन दे सकें । 1880 के अकाल आयोग ने स्थानीय निकायों के न होने से अकाल पीडित लोगों तक राहत सामग्री पहुँचाने मे आनेवाली दिक्कतों का जिक्र किया था तथा स्वशासन की सस्थाओ का विस्तार गाँवों तक भी करने की आवश्यकता पर बल दिया था । रिपन प्रस्ताव : इस पृष्ठपट मे वायसराय के रूप में लॉर्ड र्पिन जैसे उदारवादी के प्रवेश ने देश में स्थानीय सरकारों के संरचनात्मक विकास में एक ऐतिहासिक मोड का काम किया । उनके वायसराय काल में 18 मई 1882 के सरकारी प्रस्ताव को, जिसमे अधिक सख्या मे गैरसरकारी सदस्यों के भारी बहुमतवाले स्थानीय बोर्डों के गठन तथा गैरसरकारी अध्यक्ष का प्रावधान था, भारत में स्थानीय सरकार का मेग्नां कार्टा माना जाता है। इस प्रस्ताव के आने से स्थानीय शासन की भूमिका को विस्तार मिला । 'जन सेवा की भावना रखनवाले उस कुशाग्रबुद्धि वर्ग' का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से, जिसका इस्तेमाल कर पाने में विफलता न केवल नीतिएक सिंह्क्लॉोकन 13




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