जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Jambudivp Pragypati Sutra

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Jambudivp Pragypati Sutra by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नमि को कंकण की ध्वनि सुनकर यहीं पर वैराग्य उद्वुद्ध हुआ था ।३ चतुर्थ निहव सर्वमिव ने वीर्‌- निर्वाण के २२० वषे पश्चात्‌ सामूच्छेदिकवाद का यहीं से प्रवतेन किया था 13१ दशपूवंधारी जायं महागिरि का सुख्य रूप से विहार क्षेत्र भी मिथिला रहा है ।* बाणगंगा और गंडक दो नदियाँ प्राचीन काल में इस नगर के बाहर वहती थीं 133 स्थानांगसूत्र मे दसत राजधानि्यों का नो उल्लेख है, उसमे मिथिला भी एक है । जातक के अनुसार मिथिला के राजा मखादेव ने अपने सर पर एक पके बाल যী देखा तो उसे संसार की नश्वरता का अनुभव हुआ । वे संसार को छोड़कर त्यागी बने और आध्यात्मिक अन्तदुंष्टि प्राप्त की 1३४ तथागत बुद्ध भी अनेक बार मिथिला पहुँचे थे। उन्होंने वहाँ मखादेव और ब्रह्मायुयुत्तों का प्रवचन दिया ঘা ।৩+ প্রহ্প্ীতী- गाथा के अ्रनुसार वासिट्ठी नामक एक थेरी ने तथागत बुद्ध का उपदेश सुना और बौद्ध धर्म में प्रव्नजित हुए 138 बौद्ध युग में मिथिला के राजा सुमित्र ने धर्म के अभ्यास में अपने-आपको तललीन किया था ।3७ मिथिला विज्ञों की जन्मभूमि रहो है। मिथिला के तकंशास्त्री प्रसिद्ध रहे हैं।ईस्वी सन्‌ की नवभी सदी के प्रकाण्ड पण्डित मण्डन मिश्च वीक थे! उनकी धर्मपत्नी ने शंकराचायं को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। महान्‌ नैयायिक वाचस्पति मिश्र कौ यह्‌ जन्मभूमि थी। मैथिली कवि विद्यापति यहां के राजदरबार में रहते थे । कितने ही विद्वान्‌ सीतामढ़ी के पास मुहिला नामक स्थान को प्राचीन मिथिला का अ्रपश्रश मानते हैं 135 जम्बूहीप गणधर गोतम भगवान्‌ महावीर के प्रधान अन्तेवांसी थे। वे मंहान्‌ जिज्ञासु थे। उनके अस्तर्मानस में यहं श्न उंदुबुद्ध हुआ कि जम्बूंदीप कहाँ है ? कितना बड़ा है? उसका संस्थान कैसा है? उसका आकार / स्वरूप कसा है ? समाधान करते हुए भगवान्‌ महावीर ने कहा--वह सभी द्वीप-समुद्रों में आभ्यन्तर है। वह तिर्येकलोक के मंध्य में स्थित है, सबसे छोटा है, गोले है । अपने गोलाकार में यह्‌ एक लाख योजन लम्बा-चौडा है । ईंसंकी परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन तीन कोस एक सौ अट्ठाईस धनुष और साढ़े तेरंह अंगुल से कुछ अधिक है | इसके चारों और एक वेच्रमय दीवार ह 1 उस दीवार में एक जालीदार गवाक्ष भरी है और एक महान्‌ पद्मवरवेदिका है। पद्मदरवेदिका के वाहर एक विशाल वन-खण्ड है । जम्बृद्वीप के विज॑य, वैजयन्ते, जयन्त भौर अ्पराजित--ये चार द्वार हैं। जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र कहाँ है ? उसका स्वरूप क्या है? दक्षिणाद्धं भस्त और उत्तराद्ध भरत वैताद्य नामक पर्वत से किस प्रकार विभक्त हुआ है? वेतादूय पव॑त कहाँ है ? बेतादूय पव॑त पर विद्याधर श्रेणियाँ किस प्रकार है? वैताद्य पव॑त के कितने कूट/शिखर है ? सिद्धायतनं कूट कंहाँ है ? दक्षिणां भरतकूट कहाँ है? ऋषभकूट পন হাঁ है ? आदि का विस्तृत वर्णन प्रथम वक्षस्कारे मे किया गया है । जिज्ञासुगण इसका अध्ययन करें तो उन्हें बहुत कुछ अभिनव सामग्री जानने को मिलेगी । ३०. उत्तराष्ययन सुखबोधावृत्ति, पत्र १३६-१४३ ३१. विशेषावश्यकभाष्य, गाथा १३१: ३२. आवश्यक नियुक्ति, गाथा ७८२ ३३. विविधतीथेकल्प पृ. ইং ३४. जातक 1. १३७-१३८ ३५. मज्मिमनिकाय 7, ७४ আসীহ श्रागे १३३ ३६. येरयेरी माथा, प्रकाशक-- पालि रेक्सट्स सोसायटी १ ३६- ३७. चील, रोमांटिक लीजेंड श्राव द शक्य चुद्ध, पृ. ३० ३८, दी एन्शियण्ट ज्योग्राफी ऑफ इण्डिया, पृ. ७ १८ १३७ { २१]




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