भगवतलीला | Bhagavatlila

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अङ्क ] *जन्म कर्म च मे दिव्यम्‌* ९ भध 9 जन्म कर्म चमे दिव्यम्‌ हसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोग दत्त कुमार ऋषभो भगवान्‌ पिता न । विष्णु शिवाय जगता कलयावती्णंस्तेनाहता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ गुपाऽप्यये मनुरिलौपधयश्च मात्स्ये क्रौडे हतो दित्तिज उद्धरताम्भस क्ष्माम्‌। कौम धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे ग्राहात्‌ प्रपननमिभराजममुञ्चदार्तम्‌ ॥ सस्तुन्वतोऽब्धिपतिताच्छरूमणानृपीश्च शक्र च वृप्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्‌। देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नऽसुरेन्धमभयाय सता नृसिहे ॥ देवासुरे युधि च दैत्यपतीन्‌ सुरार्थे हत्वान्तेषु भुवनान्यदधात्‌ कलाभि । भूत्वाथ वामन इमामहरद्‌ बले क्षमा याच्नाच्छलेन समदाददिते सुतेभ्य 1 नि क्षत्रियामकृत गा च त्रि सप्तकृत्वो रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्मवाग्नि 1 सोऽव्धि चवन्ध दशवक्त्रमहन्‌ सलद्ध सीतापतिर्जयति लोकमलबघ्नकौर्तिं ॥ भूमेर्भरावतरणाय यदुध्वजन्मा जात॒ करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि। 'चादैर्विपोदयति यञ्ञकृतोऽतदर्हान्‌ णुद्रान्‌ कलौ शितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते ॥ एवविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पते 1 भूरीणि भृरियश्चसो वर्णितानि महाभुज ॥ (श्रीमद्धा० ११५ ४। १७-२३) भगवान्‌ विष्णुन अपन स्वरूपम एकरस स्थित रहत हुए भी सम्पूर्ण जगत्के कल्याणक लियं बहुत-से कलावतार ग्रहण किये रै । विदेहराज! हस दत्तात्रेय सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार ओर हमारे पिता ऋषभक रूपम अवतीर्णं होकर उन्हाने आत्मसाक्षात्कारकं साधनाका उपदेश किया ह । उन्दानं टी हयप्राब-अवतार लंकर मधु-कैटभ नामक असुराका सहार करके उन लागाक द्वारा चुराये हुए वेदाका उद्धार किया ट! प्रलयके समय मत्स्यावतार लेकर उन्हान भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी आर्‌ आयधियाकी-धान्यादिकी रक्ष कौ ओर वररावतार ग्रहण करकं पृथ्वीका रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका सहार करिया । कुर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान्‌ अमृत-मन्थनका कार्य सम्पन करनके लिये अपनी' पीठपर मन्दराचलं धारण किया ओर उन्हीं भगवान्‌ विष्णुते अपने शरणागतं एव आर्तं भक्त गजेनद्रको ग्राहसे चछुडाया। एक बार बालखिल्य ऋषि तपस्या करते-करते अत्यन्त दुबल हा गय थ॑। व जव कश्यप ऋषिक लिये समिधा लारहे थे तो थककर गायके खुस्से बने हुए गङ्ेम गिर पड मानो समुद्रम मिर गये हा। उन्हाने जय स्तुति की तब भगवानूने अवतार लेकर उनका उद्धार किया। वुत्रासुरको माएनेक कारण जब इद्रको ब्र्महत्या लगी आर वे उसक भयसं भागकर छिप गयं तम भगवानूने उस हत्यासे इन्द्रकी रक्षा की, और जय असुराने अनाथ देवाड्रनाआका बदी बना लिया तब भी भगवानने ही उन्‍्ह असुराक चगुलसे छुडाया। जब हिरण्यकशिपुक कारण प्रह्मद आदि सत पुरुषाका भय पहुँचने लगा तब उनको निर्भव करनके लिये भगवानूने नृसिहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपुको मार डाला। उन्हाने देववाआंकी रक्षाक लिय॑ देवासुरसग्रामम देत्यपतियोका वध किया ओर विभिन मन्वन्तराम अपनी शक्तिसं अनका कलावतार धारण करक त्रिभुवनकां रथा कौ । फिर वामन- अवतार ग्रहण करक उन्होने याचनाके बहाने इस पृथ्वीकां द॑त्यराज बलिसे छीन लिया आर अदितिनन्दन देवताआकां दे दिया। परशुराम-अवतार ग्रहण करके उन्दोने ही पृथ्वीका इक्तास चार क्षत्रियहीन किया! परशुरामजी तां हेहयवशका प्रलय करलेके लिये मानो भृगुवशम अग्रिरूपसे टौ अवतीर्णं हुए थ! उन्हीं भगवानून रामावताग्म समुदरपर पुल वोधा एव रावण ओर उसकी राजधानी लकाका मटियामट कर दिया। उनका कोतिं ममस्त लोाक मलका नट करनवाली है । सीतापति भगवान्‌ राम सदा-सर्वदा-सवत्र विजयी-ही-विजया हे । राजन्‌। अजन्मा ोनेपर भी पृथ्वीका भार उतारनेक लिय व ही भगवान्‌ यदुवशम जन्म लगे और एसे-ऐस कर्म करग जिन्ह बड-बड दवता भी नहीं कर सकत । फिर आग चलकर भगवान्‌ ही बुद्धके रूपम प्रकट हाग और यज्ञफे अनधिकारियोका यज्ञ करत॑ दखकर अनक प्रकारक तक-वितर्कोंस मोहित कर तग तथा कलियुगके अन्तम कल्कि-जवतार लेकर वे हौ शूद्र गजाआका वध करग। महाबाहु विदहराज! भगवानूकी कीर्ति अनन्त ह । महात्माआने जगत्पति भगयानूक एस-एस अनका जन्म आर कर्मो प्रचुरतास गान भा किया এ সা ४ + >;




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