स्वप्रवासवदत्त | Savpansawdat

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Savpansawdat by डॉ. ससारचन्द्र - Dr. Sasarchandra

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ. ससारचन्द्र - Dr. Sasarchandra

Add Infomation About. Dr. Sasarchandra

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
( १५ ) कठिनता से मन्‍्त्री रुमण्वान्‌ उसे सेमाले हुए है । इतना कहकर ब्रह्मचारी चला जाता है। इसी समय यौगन्धरायण भी चला जाता है| राजा की ग्रवस्था का वर्णान सुनकर पद्मावती के मन में उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है । द्वितीय श्रड्डू--पद्मावती शोर वासवदत्ता चेटी के साथ, माघवीलता- मण्डप में कन्दुकक्रीड़ा में लगी हुई हैं। वातो-बातों में उदयन का वर्णन होने लगता है । पद्मावती बतलाती है कि वह उदयन से प्रेम करती है । इतने में चेटी कह बैठती है कि समव है राजा उदयन कुरूप हो। यह्‌ सुनकर वासवदत्ता कह उठती है कि वह बहुत सुन्दर है । पद्मावती विस्मित होकर पूछती है कि उसे कैसे पता है। ऐसे श्रवसर पर वासवदत्ता अ्पने- भ्रापको संभाल लेती है श्रौर यह्‌ कह कर टाल देती है कि उजयिनी के रहने वाले को उदयन के दर्शन कठिन नही हैं। इतने मेँ पद्मावती की घान्री श्राकर सूचना देती है कि पद्मावती श्रौर उदयन के विवाह की वात पक्की हो गई है । थोडी देर वाद एक श्रौर दासी श्राती है, जो कहती है कि श्राज ही विवाह होगा | वह उन्न सबको जल्दी करने के लिए कहती है और सब अन्दर चली जाती हैं । तृतीय श्रद्धु-पय्पावती का विवाह हो रहा है। वासवदत्ता इस হম নদী श्रपनी भरांखो के सामने नही देख सकती । इसलिए वह्‌ प्रमदवन में चली जाती है । इतने मे एक दासी उसके पास प्राती है श्रौर महारानी की तरफ से विवाह की माला मथने के लिए कहती है! वासवदत्ता के हृदय में श्रनक विचार उठते लगते हँ । वह्‌ प्रपने भाग्य को कोसती दहै प्रौर कहती ই कि क्या सौत्त के विवाह की माला भी मुझे ही गूंथनी थी। वासवदत्ता सुहागवाली प्रोषधि को खूब गूंथती है श्लौर सौतनाशिनी को नही गूंथती । कुछ देर तक दासी भश्राकर माला ले जाती है भ्रौर वह वही दु ख-सागर में पडी रहती है । चतुर्थ श्रद्धु--एक दिन वासवदत्ता भ्रौर चेटी के साथ पद्मावती प्रमदवन में घृम रही थी 1 इतने में राजा श्रौर विदृपषक भी वहाँ भरा गये।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now