पूज्यश्री जवाहरलालजी की जीवनी भाग -१ | poojyashree javaaharalaalajee kee jeevanee bhaag - 1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्री वीतरागाय नम अस्तावना (অন্য --भ्री कुन्दनमलजी फिरोदिया, अध्यक्ष वबई-घारासभा >) पूज्यश्नी के प्रथम दर्शन का लाभ खमे तव मिला जव पूज्यश्नी दक्षिण प्रान्त मे पारे ध्रौर अहमदनगर शहर में ही आपका दक्षिण का प्रयम छोड़कर पूज्यश्री दक्षिण में पधारे तब ह किंचित्‌ व्यथित अन्त करण से ही पधां ट्रेनिंग कालेज के कुछ विद्योधियों ने दीक्षा लेने का पूज्यश्री पर कालेज के उस वक्त के कार्यवादक श्रौर मोतीक्लाज्न शाह ने लगाया था । पज्यश्री को इसका बढ़ा दु ख होता था । पूज्यश्नी हमेशा कहते थे कि तीथंकरों की खयाल रखकर में साधु-जीवन व्यतीत करता हैँ। धरीमान्‌ बालमुकुन्दजी सादेव सुथा और श्रीमान्‌ वार्ड भात होने पर और पूज्यश्री का उपदेश और ইহ चातुर्माप सवत्‌ १६ ६८-सें इञा । मेवाड़ मालवा रे थे रतलाम जैन निश्चय करके कालेज छोड़ दिया, उसका आरोप “जेन हितेच्छुः पत्र के सम्पादक श्री वादीलाज्ञ शज्ञा में रहकर उपदेश ओर आदेश का पूरा इसी चातुर्मास में दक्षिण के नेता शास्त्र-वेत्ता ढ्ीज्ञालजी अहमदुनगर पधारे । पूर्यश्री से रूबरू ऋ शास्त्र-शद्ध विवरण सुनने से शात्म-साक्षी




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