उपनिषद का उपदेश भाग - २ | Upanishand Ka Upadesh Vol-ii

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Upanishand Ka Upadesh Vol-ii by फोकिलेश्वर भट्टाचार्य - Phokileshwar Bhattacharya

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about फोकिलेश्वर भट्टाचार्य - Phokileshwar Bhattacharya

Add Infomation AboutPhokileshwar Bhattacharya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
अवतरणिका ॥ গু जेत्य कञानस्यरूप है * । कठोपनिपदुर्मे भाष्यकार रहते हं--? सथ चेतन এহন জীবদ্ধা शान प्रह्त चैतन्ये टौ प्राप्त है? इस स्पलमें ऐसा प्रत्माके £य) ई. मिट्ठान्त भी देखा जाता है,-” नित्प चानस्यरूप आत्मा-चै- वन्‍्पके रहनेसे दी, मनुष्यो संप रषादिका घ्रान होता है। शब्द श्पन्रसप एस आदिक सभी ' पेय पदाय हैं, उनमें कोई भी ' क्षाता ? नहों हो स- फला 1 षदोक्षि, चैवा होनेसे शब्दस्पशांदिफ परश्पर एफ दूसरेफों जाननेर्स समर्थ होते £ दस लिये इनसे स्वतन्त्र फोई एफ झाता है। बस यही शाता आश्म चैतन्य है जौर नित्प झञानस्यकूप उस झात्म-चैतन्यके द्वारा ह्वी शब्द रूपभे सुप रखादिष्षा घोध द्वोता है 1। इसो थातको लद्य कर फेनोपनिपद्‌ में भाष्पकार ने जो कुछ कद्दा है, षद भो उप्लेख-योग्य हि। वहां पर शट्रर दते दं कि“ सुख दुःखादि समस्त विक्तानोकि द्रष्टवा साछीके ফসই সাত हो जाना जाता है। बुद्धि फा जो झुद्ध प्रत्यत्त वा विज्ञान अनुभूत होता है, उस शय विज्ञानके साथ-उठस चय दिफारी विज्ञानका अन्तरालयर्ती ट्वोकर, # “नद्विज्ञानिःसतिश्षेपं नाम भवति । व्यभिचारि तु ज्ञान शोय॑ व्पभिचरति कदाचिद्षि » ( शह्टर-भाष्य, प्रश्नोपनिषद्‌ ६३ )। इस थातको आनन्द गिरिने थों समफाया है-“पटत्ञानकाले पटाभायसम्भवात्‌ थिपयाणां आन- डयमिचा रिटवं, ज्ञानस्प लु विषय-विज्ञानकालेश्यश्यम्भावनियभात शष्यभि- चारित्वम्‌ । ज्ञानस्प थिपप-विशिष्टस्वरूपेणेष व्यभिचारः ,, + 1 जाहमयेतन्यनिनिन्तमेव च चेतयितृत्वमन्येपाम्‌“तस्मादेह एदिलिश्णान्‌ रुपादीन्‌ एतेदेज देशादिष्पतिरिक्तेन विज्ञानस्यभावेन शाट्मना चिक्तेयम्‌ “1 (२।९।३) । दष लिये रुददारण्यकर्मे “'नाण्यद्सोइस्ति विज्ञाता ” एवं # न वित्ाते दिज्ञातारं विज्ञानीयाः,-इन सम्र स्थलों सें निथिकार भारम अेतन्पको ” विज्ञाता » कहा है। निह्य क्षानस्यक्प आत्मचैतन्य ही হত के विद्ाररूप विधिच विज्ञामोंका ' विज्ञाता * है। थद्िकी यूत्तियां अ- ; निस्य हि चिरूसे ह । चास्मरैतन्प नित्य चयिस्तियि সু + य॒दि ृतक्तिरृपाया दि न्रैरणित्यवाया विशातारं ,तिरपविज्षप्तिकुपेश आतारम्‌,-रामतीये ।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now