हिन्दी मे निबंध-साहित्य | Hindi Mein Nibandh Sahitya

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Hindi Mein Nibandh Sahitya by Janardan Swaroop Agrawal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिन्दी-सादित्य में निबन्ध की कल्पना टट जायगा वरन्‌ हमें दस पाँच निबधों तथा दो एक निबधकारों प्रताप नारायण मिश्र श्रादि को छोड़कर कुछ भी सादित्य न मिलेगा | श्रतः निबंध शब्द से हमारे हिन्दो के प्रमुख चाय विद्वान तथा ससा- लोचक जिस प्रकार के लेख का श्रमिप्राय रखते हैं उसी तुला पर दम अपने निबघ साहित्य को तोलेंगे। हाँ निबंध के प्रधान गुणों --अझात्मीयता तथा व्यक्तित्व--पर हमें श्रपनी दृष्टि रखनी दी होगी चाहे वे पश्चिम से हीक्योंनश्राएडों।यत्र तत्र तुलनात्मक समीक्षा के लिए पश्चिम के दृष्टिकोण का मी प्रश्नय लिया जायगा | जिस प्रकार किसी भी भाषा के साहित्य म पद्यात्सक रचनाएं गद्य से पदले निःस्यूत होती है उसां प्रकार गद्य साइस्य से कथा-कहानी नाटक-उपन्यास आदि सुष्ठ साहित्यिक निबघों से पहले प्रमूत होते हैं । कारण स्पष्ट दी हैं कि श्राख्यायिका या उपन्याम में यदि भाषा- शैथिव्य या विचारविश्वड्ु ता भी होगी तो भी पाठक का सनारजन हो जायगा किन्तु निबंध के लिए तो एक बिवेचना के उपयुक्त परिमा- जिंत शैली होनी चाहिए तथा निबंध लेखक को श्रपने वैयक्तिक दृष्टि- कोण से किसी वस्तु पर चलना झ्ावश्यक है फिर विस्तृत शरध्ययन सूदम अन्वीक्षण गभीर चितन तथा मनन भी तो श्रपेक्षित हैं--यौर ये तत्व गद्य साहित्य की प्रार मिक शवस्था से दुष्प्राप्य हैं । इसीलिए साधारण लेखो की तो बात दूसरी है किन्तु साहित्यिक निबवों का हमारे यहाँ कुछ दी काल पूव तक प्राय श्रभाव था । सुस्कृत साहित्य में भी निबंध या प्रबंध नाम से जो रचनाएं शभिदित द्दोती थी वे आधुनिक निबंध-सश्ञा-प्राप्त लेखों से नितात भिन्न रददती थीं । सस्कृत वाड्मय में निबंध केवल सूदम दाशनिक विश्लेषण के लिए. प्रयोग में लाया जाता था । फलत वे बुद्धि-विशिष्ट रूक्ष एवं वैज्ञानिक कोरि मे दी रखे जा सकते हैं । साहित्य की रसात्मकता का उनसे बहुत कुछ झ्रभाव रहा न तो उनमे व्यक्तित्व की कोई चमत्कार पूरण




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