दयानंदतिमिरभास्करः | Dayanand Timirabhaskarah

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथमसमुद्ठाससण्डनम्‌ । 4 स परमेश्वरका नाम है रुक्षदशेनाङ्कनयोः इस धाते ठक्षमीशब्द सिद्धीवाहि जो स- ब चराचर जगतके देखता”चिह्नित अथोत्‌ दृश्य बनाता जैसे शरीरके नेतरनासिका वृ- क्के पत्र पुष्य फर गर पृथ्वी जल़के कृष्ण रक्त श्वेत मृत्तिका पाषाण चंद्र सूयोदि चिन्ह बनाता तथा सबको देखता सब शोभाओंकी शोभा जीर जो वेदादि शाल यावा धार्मिक विद्वान्‌ योगियोंका रक्ष अथीत्‌ देखने योग्यहै इससे उस परमेश्वरका नाम छ- क्ष्मीहे छ गती इस धाहसे सरस्‌ और उससे महुप्‌ और डीपूपत्यय होनेसे सरस्वती शब्द सिद्ध होताहे जिसकी विविध ज्ञान अथांत्‌ शब्द अर्थ संबंध अयोगका ज्ञान य- थावत्‌ होने इससे उस परमेश्वरका नाम सरस्वत्तीहे. स. पृ. २५ पृ. १० य। शिप्यते स शेषः जो उत्पत्ति ्रकयसे वच रहहि इस्ते उसका नाम शोषहे तथा इसी प्रष्ठकी २७ पंक्तिमें शिवु कल्याणे इस धातु्से शिव शब्द सिद्ध होताहै जो कल्याण स्वरूप और कल्याण कारकहे इस छिये उस परमेश्वरका नाम शिवहे इस अकार प्रमेश्वरफे सौ ९०० नामका कथन क्रिया हे पुनः आपी क्र अभर सवथस लिखते हैं स. प. २६ पै. ८(अभ)नैसे अन्य ग्रन्थकार छोग अदि मध्य ओर अन्ते मैंगछा चरण करते है वैसा आपने न कुछ लिखा न किया ( उत्तर ) ऐसा हमको करना योग्य नहीं क्‍यों कि जो आदि मध्य और अन्त मंगठाचरण करेगा तो उस आदि मध्य जै- तके बीचमें जो ढँख होगा वीह अमंगलही रहेगा इस छिये मंगढाचरण शिष्टचारात्‌ फलदरीनाच्यूतिश्रेति यहभी सांख्यशाख्का वचन है आभग्राय यहहै कि जो न्याय प- क्षपात रहित सत्ववेदोक्त ई-वरकी आज्ञहि उसीको ययावत्‌ सर्वत्र और सदाआवचरण- करना मंगढाचरण कहातहै अंथके आर॑भसे ढेके समातति पर्यन्‍्त सत्याचारका करना- ही मंगलाचरण कहादाहै न कि कहीं मंगल कहीं अमंगल' लिखना समीक्षा-धन्यहै स्वाभीजी आपके अथ और अमिनायकों आप तो मैंगलाचरण कर- ते जाय और पूछनेपर नहीं कहे यदि आप मंगछाचरण नहीं करते तो बताइये कि सत्याथप्रकाशभूमिकाके पहछे “ओम सचिदानन्देश्वरायनमोनमः और अयथस्त्याथे- अकाक्ः ओर श्नोमित्रादि सत्याय भकाशके प्रारम्भमें और अन्तमें ५९२ पृष्ठमें फिर- शन्नोमित्र इत्यादि और यह सी नाम परमेचरके किस आशयसे ढिखेंहें तथा अपने वेदभाष्यके मत्येक अध्यायके आरम्भमें विश्वानिदेवेत्यादि क्‍यों लिखहि इससे आपके छेखानुसार यह विदित होताहै कि आपके वेदभाष्य तथा सत्याथप्रकाशर्में वीचरवें अमंगलछाचरणहीर और सत्यभीहे ऊपरके सांख्यसूतरके टीकेमें सत्यवेदीक्त इंशवरकी आज्ञा कहनी मंगलाचरणंह जीर आपने पोपादि बहुतत्ते अपशब्द ओर दुषैवन आ- गे इद पुरतकमें ठि जिनके उ्ारणकी आहा वेद्ये कदी नीं पठे नाती न उ-




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