सांख्य दर्शनम् | Sankhya Darshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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-- . प्रधमाऽच्छय का ৯ १३- छुयारेकदेशलब्धोपरागाल्न ध्यवस्था ॥ ४६ ॥ ( ९९ ) . दोनों के एकदेश में लख्घ उपंरत्षय से ध्यवस्था महों रहती 8. यदि ऐश हो तो देह के बाह्य विषयों का उपशाग चैसे धहु पुरुष फे কথ का हेतु हो, वैसे मुक्त पुरुष के बल्च का हेतु सो हो सकता-है,तव` , भहु सुत दो भं व्यवस्था नह रहती कि फौन न्दु जौर फीन इकू है २९ .दुष्टवशाञ्चेत्‌ ॥ ३० ॥ (३० )यदि भद्द से ( व्यवस्थर मानो तौ }-उत्तर~ न दुयोरेककालाउयोगादु पकार्यो पकारकभावाः ॥ ११॥ (३१) 'दीनों के एकफाल में योग न होने से ठंपकाये उपकारक भाव नहीं होसकता ॥ `यदि फोई ३० परुत्नोक्त शड्डा करे कि भट्ट ( प्रारछ्य ) बश से देह की. बाह्य विषयों का. उपरा बहु पुरुष के सम्राव मुक्त को भहीँ हो उकता,- सो३१ वां सूत्रकह्ता है कि कत्ता पुरुष गौर भोका पुरूष ये दोनों খিকके मत.में एकफालीन नहीं, पूर्वक्षण में कत्ता ( चित्त ) उत्तरघ्शभावी भोक्ता से भिक्त है,तत्र दोनों (कर्ता भोक्ता) एफदाथ न रहे, इस दुशा में दोनों स उपायं उपकारक भाष नंदीं हो सकता । जिस पर उपकार ही` धह .दपकशायं भौर को ठपकार फर वह उपकारकः होता है। सजा फिर . छाब कत्तों और भोक्ता एक काल में न हुवे, भिंक २ फालों में पूव पर भेद सेরঙ, हवे কী ঘুইক্চায জী के भटृष्ट प्रारण्य फा उपकार उत्तरकोलस्थ भोक्तापर कैसे हो सक्ता है। इस. लिये घदृष्ट से भी व्यवस्था भट्ठों बनती ॥३९॥ = पत्रकमेषदिति चेत्‌ ॥ है३ ॥ (११) .यदि पुत्र के ( गर्भाघानादि संस्कार ) के के तुरुय ( फही तौ )- 5 আঘাঁজ অতি জাই फहे फि जैसे गर्मोघानादि संस्कारों से पुत्र पा करे- . (संस्कार) पिता फरता है और उ६ खे पुत्र का उपंकार दोता है, यद्यपि पुपरपचात काण मे भीर দিলা पूर्वकाल म ६, हौ कत्ता भोक्ता देने एककालमें तहोंतौ भी एक करत्तों दूसरे भोक्ता का उपकार कर सकता है,ती दोनों... सें-उपकार्थोपकारक साव फ्यों नहीं हो सकता ! तो उत्तर यह ই দি-




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