शुद्धि विवेचन | Shuddhi Vivechan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शुद्धिविदेखन । - (१७ ) गोवधोऽयाज्यसेयाज्यः पारदायासविक्रयः। गुरुमातपितृत्यागः खाष्यायागन्योःखतस्य चा गोका चष अयोग्यक्ो यज्ञ कराना पर सीमन करना ओर आत्माका बेचना आत्मविरुद्ध धन लेना गुरु माता पिता -अम्तिहोत्र स्यागना यह पातक हीं है वेदों को त्यागना ओर वेदकी निन्दा करना अ- भक्ष्य वस्तुको खाना मोषध करना अम्निहोत न करना भगि नी. इत्यादि. रिस्तेवालीसे विवाह करना इत्यादि रक्षण म्लेच्छ मे परस्परसिदी पायेजतिदं । स्वच्छा से सोदथ करने -को व्यवस्था नहीं दनतीह्‌ ।बे पतितदी कियेजाते द । নর कौन भ्रायथित्त योग्य हे सो भी तो विचारना था शुद्धिक नेता भाश्यो ! आपत्ति धम ओद आके एक बारी एसरमान शसा तेथा अन्त्यन ` लोगों एर शुद्धि का हाथ मारने छगे न जाने इन्हें शुद्ध करके कोनसी सभ्यता प्राप्त 'होतीहे । यदि आपका चित्त भारत सुधार पर কমা रै तो अनुचित नदी उदित उघोग करो मिंससे' মাং चारों वर्ण -आपको - धन्पं ९ री कर +




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