वेदोपनिषत अथवा औपनिषद-श्रुतिसंग्रह | Vedopanishat athava Aupanishad Shrutisangrah

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
90
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ओश्मअथ जल्लोचोपनिवेस्.वा
व्रहनोत्तरोपनिषत( यजुः २३1 ४५-६२ ६३-६५ )
भ-कःसपिदेकाकी चरति क उ स्िञजायते पुनः ।
फिसिद्धिमस्य भेषजं किम्बावपनं पत् ॥१॥
उ-सुय्ये एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः।
उभ्नििमस्य भेषजं भूमिरावपनं मदत् ॥ २॥
भरन--१. ( कः +-स्विद्) कोन सा (एकाकी ) अकेखा (चरति)
-विचरता है । २. ओर ( कः + सिद ) कोन सा ( पुनः ) फिर. बार
चार (जायते) पैदा होता है । ३. ( हिमस्य) सरदी की, जडता की,
अज्ञान की (भेषजं) दवाई (किं+-ल्िित्) कीन सी दै । ४८ +ड)
-कौन सा (महत्) वड़ा (आवपनं) वोते तथा काटने का स्थान है ॥१॥
उत्तर-(१) (सूर्यः) सूर्य (एकाकी) अकेटा (चरति) विचस्ता है ।
(২) (चन्द्रमाः) चन्द्रमा (पुनः) फिर, वारवार (जायते) जन्म लेता
है (३ (अग्निः) आग; ज्ञान (हिमस्य) जडता आदि की (मेषजं)
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