हिंदी एकांगी | Hindi Ekangi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वे न तो संस्कृत के अनुकरण पर हैं, न अंगरेजी के । कला की सूदछृम दृष्टि इनमें नहीं आयी | प्रतः हम इन्दं हिन्दी के एकद्धियां की प्रथमवि्था कद सक्ते हैं। १० रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी-सादित्य के इतिहास के 'संशोवित और परिवर्डधित संह्करण' के पृष्ठ ६०८ पर लिखा हैः प्ये एक व्यक्ति अंगरेजी में एक अड्ट वाले आधुनिक नाटक देख उन्दी के ढड्ठ के दो एक एकाझी नाटक लिखकर उन्हें बिल्कुल एक नई चीज कहते हुए सामने लाए । ऐसे लोगों को जान रखना चाहिए कि एक अड्डे वाले कह, उपछपक हमारे यहाँ चहुत पहले से माने ग्रए उपष्ठपक के उल्ल्लेख से प्रतीत होता है कि शुक्लजी का .'हमारे यहाँ? शब्दों से अभिष्राय हमारी संस्क्ृत्त की संपत्ति से है। जेसा हम परिशिष्ट में संस्कत सें एदकोः में चिस्तार से प्रकट करेंगे। हमारे यर्दा एक द्ग वाले कई उपषूपक दी नदीं रूपक भी थे । (भारः तथा श्रदक्षनः जो पहले तथा बाद में भी अत्यन्त जन-प्रिय रहे, रूपऊ के ही भेद हैं,, उपहपक के नदी । फिर जैसा हमने इसी अध्याय में विद्ध किया है हिन्दी में एकाड्डियों की पराम्परा भारतेन्दु काल से ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार नाटक की । ' जैसे नए ठन्न कै नारकं का आश्चयेमय आरम्भ 'प्रसाद', उदयशद्डर भट्ट या लक्ध्मीनारायण मिश्र के द्वारा नही माना जा सकता, उसी प्रकार एकाड्डियो. का मी श्रस्वयेमय नवारम्भ प्रसाद, डाक्टर रामकुमार वर्मा, उपेन्द्रनाथ मशक, भुवनेश्वर या उग्र से नही माना ज। सकता ह+ इन लोगों ने तो छिन्द बाहरी प्रभावों से ओर आवश्यकताओं से प्रेरित होकर इनकी पुनस्थपना 3£ आधुनिक हिन्दी नाटक नाम की पुस्तक में प्रो० नगेनद्रजी ने लिखा है “हिन्दी एकांकी का इतिहास गत दस वर्षो मे सिमरा हुआ है” ये पंक्षियों लेखक इस काल के यथाथे अध्ययन के अभाव फे कारण ही लिख सका । इस पाठ में जो साक्तियाँ एकाडियो के सम्बन्ध में दी गयी है, जब उन पर विचार किया जायगा तो यह मानना पड़ेया कि एकषष्टी नहीं? और भी “एक वु(ट' के कितने ही पूर्वेज हैं, ओर आज के एकाकी के मूलतत्व मोटे रूप में इनमें भी हैं ।




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